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Rigveda Mandal 1 / Sukta 18 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/18/4
Devata- ब्रह्मणस्पतिरिन्द्रश्च सोमश्च Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स घा॑ वी॒रो न रि॑ष्यति॒ यमिन्द्रो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑। सोमो॑ हि॒नोति॒ मर्त्य॑म्॥

सः । घ॒ । वी॒रः । न । रि॒ष्य॒ति॒ । यम् । इन्द्रः॑ । ब्रह्म॑णः । पतिः॑ । सोमः॑ । हि॒नोति॑ । मर्त्य॑म् ॥

Mantra without Swara
स घा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः। सोमो हिनोति मर्त्यम्॥

सः। घ। वीरः। न। रिष्यति। यम्। इन्द्रः। ब्रह्मणः। पतिः। सोमः। हिनोति। मर्त्यम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 34 Mantra » 4

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Meaning
उक्त इन्द्र (ब्रह्मणस्पतिः) ब्रह्माण्ड का पालन करनेवाला जगदीश्वर और (सोमः) सोमलता आदि ओषधियों का रससमूह (यम्) जिस (मर्त्यम्) मनुष्य आदि प्राणी को (हिनोति) उन्नतियुक्त करते हैं, (सः) वह (वीरः) शत्रुओं का जीतनेवाला वीर पुरुष (न घ रिष्यति) निश्चय है कि वह विनाश को प्राप्त कभी नहीं होता॥४॥
Essence
जो मनुष्य वायु, विद्युत्, सूर्य्य और सोम आदि ओषधियों के गुणों को ग्रहण करके अपने कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे कभी दुखी नहीं होते॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्रादिकों के कार्य्यों का उपदेश किया है-

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