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Rigveda Mandal 1 / Sukta 18 / Mantra 2

191 Sukta
9 Mantra
1/18/2
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो रे॒वान्यो अ॑मीव॒हा व॑सु॒वित्पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः। स नः॑ सिषक्तु॒ यस्तु॒रः॥

यः । रे॒वान् । यः । अ॒मी॒व॒ऽहा । व॒सु॒ऽवित् । पु॒ष्टि॒ऽवर्ध॑नः । सः । नः॒ । सि॒स॒क्तु॒ । यः । तु॒रः ॥

Mantra without Swara
यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः। स नः सिषक्तु यस्तुरः॥

यः। रेवान्। यः। अमीवऽहा। वसुऽवित्। पुष्टिऽवर्धनः। सः। नः। सिसक्तु। यः। तुरः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 34 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो जगदीश्वर (रेवान्) विद्या आदि अनन्त धनवाला, (यः) जो (पुष्टिवर्धनः) शरीर और आत्मा की पुष्टि बढ़ाने तथा (वसुवित्) सब पदार्थों का जानने (अमीवहा) अविद्या आदि रोगों का नाश करने तथा (यः) जो (तुरः) शीघ्र सुख करनेवाला वेद का स्वामी जगदीश्वर है, (सः) सो (नः) हम लोगों को विद्या आदि धनों के साथ (सिषक्तु) अच्छी प्रकार संयुक्त करे॥२॥
Essence
जो मनुष्य सत्यभाषण आदि नियमों से संयुक्त ईश्वर की आज्ञा का अनुष्ठान करते हैं, वे अविद्या आदि रोगों से रहित और शरीर वा आत्मा की पुष्टिवाले होकर चक्रवर्त्ति राज्य आदि धन तथा सब रोगों की हरनेवाली ओषधियों को प्राप्त होते हैं॥२॥
Subject
फिर वह ईश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-