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Rigveda Mandal 1 / Sukta 179 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/179/5
Devata- दम्पती Rishi- लोपमुद्राऽगस्त्यौ Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒मं नु सोम॒मन्ति॑तो हृ॒त्सु पी॒तमुप॑ ब्रुवे। यत्सी॒माग॑श्चकृ॒मा तत्सु मृ॑ळतु पुलु॒कामो॒ हि मर्त्य॑: ॥

इ॒मम् । नु । सोम॑म् । अन्ति॑तः । हृ॒त्ऽसु । पी॒तम् । उप॑ । ब्रु॒वे॒ । यत् । सी॒म् । आगः॑ । च॒कृ॒म । तत् । सु । मृ॒ळ॒तु॒ । पु॒लु॒ऽकामः॑ । हि । मर्त्यः॑ ॥

Mantra without Swara
इमं नु सोममन्तितो हृत्सु पीतमुप ब्रुवे। यत्सीमागश्चकृमा तत्सु मृळतु पुलुकामो हि मर्त्य: ॥

इमम्। नु। सोमम्। अन्तितः। हृत्ऽसु। पीतम्। उप। ब्रुवे। यत्। सीम्। आगः। चकृम। तत्। सु। मृळतु। पुलुऽकामः। हि। मर्त्यः ॥ १.१७९.५

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 22 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
मैं (यत्) जिस (इमम्) इस (हृत्सु) हृदयों में (पीतम्) पिये हुए (सोमम्) ओषधियों के रस के (उप, ब्रुवे) उपदेशपूर्वक कहता हूँ उसको (पुलुकामः) बहुत कामनावाला (मर्त्यः) पुरुष (हि) ही (सुमृलतु) सुखसंयुक्त करे अर्थात् अपने सुख में उसका संयोग करे। जिस (आगः) अपराध को हम लोग (चकृम) करें (तत्) उसको (नु) शीघ्र (सीम्) सब ओर से (अन्तिमः) समीप से सभी जन छोड़ें अर्थात् क्षमा करें ॥ ५ ॥
Essence
जो महौषधियों के रस को पीते हैं, वे रोगरहित बलिष्ठ होते हैं, जो कुपथ्याचरण करते हैं, वे रोगों से पीड्यमान होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
अब प्रकृत विषय में महौषधियों के सारसंग्रह को कहा है ।