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Rigveda Mandal 1 / Sukta 178 / Mantra 5

191 Sukta
5 Mantra
1/178/5
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वया॑ व॒यं म॑घवन्निन्द्र॒ शत्रू॑न॒भि ष्या॑म मह॒तो मन्य॑मानान्। त्वं त्रा॒ता त्वमु॑ नो वृ॒धे भू॑र्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥

त्वया॑ । व॒यम् । म॒घ॒ऽव॒न् । इ॒न्द्र॒ । शत्रू॑न् । अ॒भि । स्या॒म॒ । म॒ह॒तः । मन्य॑मानान् । त्वम् । त्रा॒ता । त्वम् । ऊँ॒ इति॑ । नः॒ । वृ॒धे । भूः॒ । वि॒द्याम॑ । इ॒षम् । वृ॒जन॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् ॥

Mantra without Swara
त्वया वयं मघवन्निन्द्र शत्रूनभि ष्याम महतो मन्यमानान्। त्वं त्राता त्वमु नो वृधे भूर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥

त्वया। वयम्। मघऽवन्। इन्द्र। शत्रून्। अभि। स्याम। महतः। मन्यमानान्। त्वम्। त्राता। त्वम्। ऊँ इति। नः। वृधे। भूः। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरऽदानुम् ॥ १.१७८.५

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 5

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Meaning
हे (मघवन्) परम प्रशंसित धनयुक्त (इन्द्र) शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाले ! (त्वया) आपके साथ वर्त्तमान (वयम्) हम लोग (महतः) प्रबल (मन्यमानान्) अभिमानी (शत्रून्) शत्रुओं को जीतनेवाले (अभि, स्याम) सब ओर से होवें (त्वम्) आप (नः) हमारे (त्राता) रक्षक सहायक और (त्वम्, उ) आप तो ही (वृधे) वृद्धि के लिये (भूः) हो जिससे हम लोग (इषम्) प्रत्येक काम की प्रेरणा (वृजनम्) बल और (जीरदानुम्) जीव-स्वभाव को (विद्याम) पावें ॥ ५ ॥
Essence
जो युद्ध करनेवाले भृत्यों का सर्वथा सत्कार कर और उनको उत्साह दे युद्ध करते हैं, युद्ध करते हुओं की निरन्तर रक्षा और मरे हुओं के पुत्र, कन्या और स्त्रियों की पालना करें वे सब सर्वत्र विजय करनेवाले हों ॥ ५ ॥इस सूक्त में सेनापति के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ अठहत्तरवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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