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Rigveda Mandal 1 / Sukta 178 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/178/4
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वा नृभि॒रिन्द्र॑: सुश्रव॒स्या प्र॑खा॒दः पृ॒क्षो अ॒भि मि॒त्रिणो॑ भूत्। स॒म॒र्य इ॒षः स्त॑वते॒ विवा॑चि सत्राक॒रो यज॑मानस्य॒ शंस॑: ॥

ए॒व । नृऽभिः॑ । इन्द्रः॑ । सु॒ऽश्र॒व॒स्या । प्र॒ऽखा॒दः । पृ॒क्षः । अ॒भि । मि॒त्रिणः॑ । भू॒त् । स॒ऽम॒र्ये । इ॒षः । स्त॒व॒ते॒ । विऽवा॑चि । स॒त्रा॒ऽक॒रः । यज॑मानस्य । शंसः॑ ॥

Mantra without Swara
एवा नृभिरिन्द्र: सुश्रवस्या प्रखादः पृक्षो अभि मित्रिणो भूत्। समर्य इषः स्तवते विवाचि सत्राकरो यजमानस्य शंस: ॥

एव। नृऽभिः। इन्द्रः। सुऽश्रवस्या। प्रऽखादः। पृक्षः। अभि। मित्रिणः। भूत्। सऽमर्ये। इषः। स्तवते। विऽवाचि। सत्राऽकरः। यजमानस्य। शंसः ॥ १.१७८.४

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 4

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Meaning
(नृभिः) वीर पुरुषों के साथ (इन्द्रः) सेनापति (सुश्रवस्या) उत्तम अन्न की इच्छा से (पृक्षा) दूसरे को बता देने को चाहा हुआ अन्न उसको (प्रखादः) अतीव खानेवाला और (मित्रिणः) मित्र जिसके वर्त्तमान उसके (अभि, भूत्) सम्मुख हो तथा (विवाचि) नाना प्रकार की विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त वीर जन के निमित्त (सत्राकरः) सत्य व्यवहार करने और (यजमानस्य) देनेवाले की (शंसः) प्रशंसा करनेवाला (समर्य्ये) उत्तम बणियें के निमित्त (इषः) अन्नों की (स्तवते) स्तुति प्रशंसा करता (एव) ही है ॥ ४ ॥
Essence
जो उद्योगी और सत्यवादी जन सत्योपदेश करते हैं, वे नायक, अधिपति और अग्रगामी होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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