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Rigveda Mandal 1 / Sukta 178 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/178/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जेता॒ नृभि॒रिन्द्र॑: पृ॒त्सु शूर॒: श्रोता॒ हवं॒ नाध॑मानस्य का॒रोः। प्रभ॑र्ता॒ रथं॑ दा॒शुष॑ उपा॒क उद्य॑न्ता॒ गिरो॒ यदि॑ च॒ त्मना॒ भूत् ॥

जेता॑ । नृऽभिः॑ । इन्द्रः॑ । पृ॒त्ऽसु । शूरः॑ । श्रोता॑ । हव॑म् । नाध॑मानस्य । का॒रोः । प्रऽभ॑र्ता । रथ॑म् । दा॒शुषः॑ । उ॒पा॒के । उत्ऽय॑न्ता । गिरः॑ । यदि॑ । च॒ । त्मना॑ । भूत् ॥

Mantra without Swara
जेता नृभिरिन्द्र: पृत्सु शूर: श्रोता हवं नाधमानस्य कारोः। प्रभर्ता रथं दाशुष उपाक उद्यन्ता गिरो यदि च त्मना भूत् ॥

जेता। नृऽभिः। इन्द्रः। पृत्ऽसु। शूरः। श्रोता। हवम्। नाधमानस्य। कारोः। प्रऽभर्ता। रथम्। दाशुषः। उपाके। उत्ऽयन्ता। गिरः। यदि। च। त्मना। भूत् ॥ १.१७८.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यदि) जो (नृभिः) नायक वीरों के साथ (शूरः) शत्रुओं की हिंसा करनेवाला (जेता) विजयशील (नाधमानस्य) माँगते हुए (कारोः) कार्यकारी पुरुष के (हवम्) ग्रहण करने योग्य विद्याबोध को (श्रोता) सुननेवाला (प्रभर्त्ता) उत्तम विद्याओं का धारण करनेवाला (दाशुषः) दानशील के (उपाके) समीप (गिरः) वाणियों का (उद्यन्ता) उद्यम करनेवाला (इन्द्रः) सेनाधीश तूँ (त्मना) अपने से (पृत्सु) संग्रामों में (रथम्) रथ को (च) भी ग्रहण करके प्रवृत्त (भूत्) होवे उसका दृढ़ विजय हो ॥ ३ ॥
Essence
जो विद्या की याचना करें, उसको निरन्तर विद्या देवें। जो जितेन्द्रिय सत्यवादी होते हैं, उन्हीं को विद्या प्राप्त होती है। जो विद्या और शरीर बलों से शत्रुओं के साथ युद्ध करते हैं, उनका कैसे पराजय हो ? ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।