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Rigveda Mandal 1 / Sukta 177 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/177/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ ति॑ष्ठ॒ रथं॒ वृष॑णं॒ वृषा॑ ते सु॒तः सोम॒: परि॑षिक्ता॒ मधू॑नि। यु॒क्त्वा वृष॑भ्यां वृषभ क्षिती॒नां हरि॑भ्यां याहि प्र॒वतोप॑ म॒द्रिक् ॥

आ । ति॒ष्ठ॒ । रथ॑म् । वृष॑णम् । वृषा॑ । ते॒ । सु॒तः । सोमः॑ । परि॑ऽसिक्ता । मधू॑नि । यु॒क्त्वा । वृष॑ऽभ्याम् । वृ॒ष॒भ॒ । क्षि॒ती॒नाम् । हरि॑ऽभ्याम् । या॒हि॒ । प्र॒ऽवता॑ । उप॑ । म॒द्रिक् ॥

Mantra without Swara
आ तिष्ठ रथं वृषणं वृषा ते सुतः सोम: परिषिक्ता मधूनि। युक्त्वा वृषभ्यां वृषभ क्षितीनां हरिभ्यां याहि प्रवतोप मद्रिक् ॥

आ। तिष्ठ। रथम्। वृषणम्। वृषा। ते। सुतः। सोमः। परिऽसिक्ता। मधूनि। युक्त्वा। वृषऽभ्याम्। वृषभ। क्षितीनाम्। हरिऽभ्याम्। याहि। प्रऽवता। उप। मद्रिक् ॥ १.१७७.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषभ) दूसरों के सामर्थ्य रोकने से बलिष्ठ राजन् ! (मद्रिक्) हम लोगों को प्राप्त होते और (वृषा) रस आदि से परिपूर्ण होते हुए आप जो (ते) अपने लिये (सोमः) सोमलता आदि का रस (सुतः) उत्पन्न किया गया है उसमें (मधूनि) मीठे मीठे पदार्थ (परिषिक्ता) सब ओर से सींचे हुए हैं उस रस को पीकर (क्षितीनाम्) मनुष्यों के (वृषभ्याम्) प्रबल (हरिभ्याम्) हरणशील घोड़ों से (वृषणम्) दृढ़ (रथम्) रथ को (युक्त्वा) जोड़ युद्ध का (आ, तिष्ठ) यत्न करो वा युद्ध की प्रतिज्ञा पूर्ण करो और (प्रवता) नीचे मार्ग से (उप, याहि) समीप आओ ॥ ३ ॥
Essence
जो आहार-विहार से सोमादि ओषधियों के रस के सेवनेवाले, दीर्घ ब्रह्मचर्य्य, किये हुए शरीर और आत्मा के बल से युक्त राजजन बिजुली आदि पदार्थों के वेग से युक्त यानों को सिद्ध कर दण्ड से दुष्टों को निवारण कर न्याय से राज्य की रक्षा कराया करें, वे ही सुखी होते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।