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Rigveda Mandal 1 / Sukta 177 / Mantra 2

191 Sukta
5 Mantra
1/177/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये ते॒ वृष॑णो वृष॒भास॑ इन्द्र ब्रह्म॒युजो॒ वृष॑रथासो॒ अत्या॑:। ताँ आ ति॑ष्ठ॒ तेभि॒रा या॑ह्य॒र्वाङ्हवा॑महे त्वा सु॒त इ॑न्द्र॒ सोमे॑ ॥

ये । ते॒ । वृष॑णः । वृ॒ष॒भासः॑ । इ॒न्द्र॒ । ब्र॒ह्म॒ऽयुजः॑ । वृष॑ऽरथासः । अत्याः॑ । तान् । आ । ति॒ष्ठ॒ । तेभिः॑ । आ । या॒हि॒ । अ॒र्वाङ् । हवा॑महे । त्वा॒ । सु॒ते । इ॑न्द्र । सोमे॑ ॥

Mantra without Swara
ये ते वृषणो वृषभास इन्द्र ब्रह्मयुजो वृषरथासो अत्या:। ताँ आ तिष्ठ तेभिरा याह्यर्वाङ्हवामहे त्वा सुत इन्द्र सोमे ॥

ये। ते। वृषणः। वृषभासः। इन्द्र। ब्रह्मऽयुजः। वृषऽरथासः। अत्याः। तान्। आ। तिष्ठ। तेभिः। आ। याहि। अर्वाङ्। हवामहे। त्वा। सुते। इन्द्र। सोमे ॥ १.१७७.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्त्तमान राजन् ! (ते) आपके (ये) जो (वृषणः) प्रबल ज्वान (वृषभासः) वृषभ (ब्रह्मयुजः) उत्तम अन्न का योग करनेवाले (वृषरथासः) शक्तिबन्धक और रमण साधन रथ (अत्याः) और निरन्तर गमनशील घोड़े हैं (तान्) उनको (आ, तिष्ठ) यत्नवान् करो अर्थात् उन पर चढ़ो, उन्हें कार्यकारी करो। हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्त्तमान राजन् ! हम लोग (सुते) उत्पन्न हुए (सोमे) ओषधि आदिकों के गुण के समान ऐश्वर्य के निमित्त (त्वा) आपको (हवामहे) स्वीकार करते हैं आप (तेभिः) उनके साथ (अर्वाङ्) सम्मुख (आ, याहि) आओ ॥ २ ॥
Essence
जो राजजन समस्त साधनों से साध्य रथों, प्रबल घोड़ों और बैलों को कार्य्यों में संयुक्त कराते हैं, वे प्रशस्त यान आदि पदार्थों से युक्त हुए ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में राजविषय का उपदेश किया है ।