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Rigveda Mandal 1 / Sukta 176 / Mantra 6

191 Sukta
6 Mantra
1/176/6
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यथा॒ पूर्वे॑भ्यो जरि॒तृभ्य॑ इन्द्र॒ मय॑ इ॒वापो॒ न तृष्य॑ते ब॒भूथ॑। तामनु॑ त्वा नि॒विदं॑ जोहवीमि वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥

यथा॑ । पूर्वे॑भ्यः । ज॒रि॒तृऽभ्यः॑ । इ॒न्द्र॒ । मयः॑ऽइव । आपः॑ । न । तृष्य॑ते । ब॒भूथ॑ । ताम् । अनु॑ । त्वा॒ । नि॒ऽविद॑म् । जो॒ह॒वी॒मि॒ । वि॒द्याम॑ । इ॒षम् । वृ॒जन॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् ॥

Mantra without Swara
यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मय इवापो न तृष्यते बभूथ। तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥

यथा। पूर्वेभ्यः। जरितृऽभ्यः। इन्द्र। मयःऽइव। आपः। न। तृष्यते। बभूथ। ताम्। अनु। त्वा। निऽविदम्। जोहवीमि। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरऽदानुम् ॥ १.१७६.६

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) योग के ऐश्वर्य का ज्ञान चाहते हुए जन ! (यथा) जैसे योग जानने की इच्छावाले (पूर्वेभ्यः) किया है योगाभ्यास जिन्होंने उन प्राचीन (जरितृभ्यः) योग गुण सिद्धियों के जाननेवाले विद्वानों से योग को पाकर और सिद्ध कर होते अर्थात् योगसम्पन्न होते हैं वैसे होकर (मयइव) सुख के समान और (तृष्यते) पियासे के लिये (आपः) जलों के (न) समान (बभूथ) हूजिये और (ताम्) उस विद्या के (अनु) अनुवर्त्तमान (निविदम्) और निश्चित प्रतिज्ञा जिन्होंने की उन (त्वा) आपको (जोहवीमि) निरन्तर कहता हूँ ऐसे कर हम लोग (इषम्) इच्छासिद्धि (वृजनम्) दुःखत्याग और (जीरदानुम्) जीवदया को (विद्याम) प्राप्त हों ॥ ६ ॥
Essence
जो जिज्ञासु जन योगारूढ़ पुरुषों से योगशिक्षा को प्राप्त होकर पुरुषार्थ से योग का अभ्यास कर सिद्ध होते हैं, वे पूर्ण सुख को पाते और जो उत्तम योगियों का सेवन करते, वे भी सुख को प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥इस सूक्त में विद्या, पुरुषार्थ और योग का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह एकसौ छिहत्तरवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब प्रकृत विषय में योग के पुरुषार्थ का वर्णन किया जाता है ।