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Rigveda Mandal 1 / Sukta 176 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/176/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यस्य॒ विश्वा॑नि॒ हस्त॑यो॒: पञ्च॑ क्षिती॒नां वसु॑। स्पा॒शय॑स्व॒ यो अ॑स्म॒ध्रुग्दि॒व्येवा॒शनि॑र्जहि ॥

यस्य॑ । विश्वा॑नि । हस्त॑योः । पञ्च॑ । क्षि॒ती॒नाम् । वसु॑ । स्पा॒शय॑स्व । यः । अ॒स्म॒ऽध्रुक् । दि॒व्याऽइ॑व । अ॒शनिः॑ । ज॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
यस्य विश्वानि हस्तयो: पञ्च क्षितीनां वसु। स्पाशयस्व यो अस्मध्रुग्दिव्येवाशनिर्जहि ॥

यस्य। विश्वानि। हस्तयोः। पञ्च। क्षितीनाम्। वसु। स्पाशयस्व। यः। अस्मऽध्रुक्। दिव्याऽइव। अशनिः। जहि ॥ १.१७६.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! (यस्य) जिनके आप (हस्तयोः) हाथों में (पञ्च) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद इन जातियों के (क्षितीनाम्) मनुष्यों के (विश्वानि) समस्त (वसु) विद्याधन हैं सो आप (यः) जो (अस्मध्रुक्) हम लोगों को द्रोह करता है उसको (स्पाशयस्व) पीड़ा देओ और (अशनिः) बिजुली (दिव्येव) जो आकाश में उत्पन्न हुई और भूमि में गिरी हुई संहार करती है उसके समान (जहि) नष्ट करे ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिसके अधिकार में समग्र विद्या हैं, जो उत्पन्न हुए शत्रुओं को मारता है वह दिव्य ऐश्वर्य प्राप्ति करानेवाला होता है ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।