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Rigveda Mandal 1 / Sukta 176 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/176/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तस्मि॒न्ना वे॑शया॒ गिरो॒ य एक॑श्चर्षणी॒नाम्। अनु॑ स्व॒धा यमु॒प्यते॒ यवं॒ न चर्कृ॑ष॒द्वृषा॑ ॥

तस्मि॑न् । आ । वे॒श॒य॒ । गिरः॑ । यः । एकः॑ । च॒र्ष॒णी॒नाम् । अनु॑ । स्व॒धा । यम् । उ॒प्यते॑ । यव॑म् । न । चर्कृ॑षत् । वृषा॑ ॥

Mantra without Swara
तस्मिन्ना वेशया गिरो य एकश्चर्षणीनाम्। अनु स्वधा यमुप्यते यवं न चर्कृषद्वृषा ॥

तस्मिन्। आ। वेशय। गिरः। यः। एकः। चर्षणीनाम्। अनु। स्वधा। यम्। उप्यते। यवम्। न। चर्कृषत्। वृषा ॥ १.१७६.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 19 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! (तस्मिन्) उसमें (गिरः) उपदेशरूप वाणियों को (आ, वेशय) अच्छे प्रकार प्रविष्ट कराइये कि (यः) जो (चर्षणीनाम्) मनुष्यों में (एकः) एक अकेला सहायरहित दीनजन है और (यम्) जिसका (अनु) पीछा लखिकर (चर्कृषत्) निरन्तर भूमि को जोतता हुआ (वृषा) कृषिकर्म में कुशल जन जैसे (यवम्) यव अन्न को (न) बोओ वैसे (स्वधा) अन्न (उप्यते) बोया जाता अर्थात् भोजन दिया जाता है ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कृषिवल खेती करनेवाले उत खेतों में बीजों को बोकर अन्नों वा धनों को पाते हैं, वैसे विद्वान् जन ज्ञान विद्या चाहनेवाले शिष्य जनों के आत्मा में विद्या और उत्तम शिक्षा प्रवेश करा सुखों को प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
Subject
अब प्रकृत विषय में विद्यारूप वीज के विषय को कहते हैं ।