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Rigveda Mandal 1 / Sukta 175 / Mantra 6

191 Sukta
6 Mantra
1/175/6
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यथा॒ पूर्वे॑भ्यो जरि॒तृभ्य॑ इन्द्र॒ मय॑ इ॒वापो॒ न तृष्य॑ते ब॒भूथ॑। तामनु॑ त्वा नि॒विदं॑ जोहवीमि वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥

यथा॑ । पूर्वे॑भ्यः । ज॒रि॒तृऽभ्यः॑ । इ॒न्द्र॒ । मयः॑ऽइव । आपः॑ । न । तृष्य॑ते । ब॒भूथ॑ । ताम् । अनु॑ । त्वा॒ । नि॒ऽविद॑म् । जो॒ह॒वी॒मि॒ । वि॒द्याम॑ । इ॒षम् । वृ॒जन॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् ॥

Mantra without Swara
यथा पूर्वेभ्यो जरितृभ्य इन्द्र मय इवापो न तृष्यते बभूथ। तामनु त्वा निविदं जोहवीमि विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥

यथा। पूर्वेभ्यः। जरितृऽभ्यः। इन्द्र। मयःऽइव। आपः। न। तृष्यते। बभूथ। ताम्। अनु। त्वा। निऽविदम्। जोहवीमि। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरऽदानुम् ॥ १.१७५.६

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 6

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विद्यैश्वर्ययुक्त ! (यथा) जिस प्रकार नित्य विद्या से (पूर्वेभ्यः) प्रथम विद्या अध्ययन किये (जरितृभ्यः) समस्त विद्या गुणों की स्तुति करनेवाले जनों के लिए (मयइव) सुख के समान वा (तृष्यते) तृषा से पीड़ित जन के लिये (आपः) जलों के (न) समान आप (बभूथ) हूजिये, (ताम्) उस (निविदम्) नित्य विद्या के (अनु) अनुकूल (त्वा) आपकी मैं (जीहवीमि) निरन्तर स्तुति करता हूँ और इसीसे हम लोग (इषम्) इच्छासिद्धि (वृजनम्) बल और (जीरदानुम्) आत्मस्वरूप को (विद्याम) प्राप्त होवें ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो ब्रह्मचर्य के साथ शास्त्रज्ञ धर्मात्माओं से विद्या और शिक्षा पाकर औरों को देते हैं, वे सुख से तृप्त होते हुए प्रशंसा को प्राप्त होते हैं और जो विरोध को छोड़ परस्पर उपदेश करते हैं, वे विज्ञान, बल और जीवात्मा-परमात्मा के स्वरूप को जानते हैं ॥ ६ ॥इस सूक्त में राजव्यवहार के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह एकसौ पचहत्तरवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।