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Rigveda Mandal 1 / Sukta 175 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/175/5
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
शु॒ष्मिन्त॑मो॒ हि ते॒ मदो॑ द्यु॒म्निन्त॑म उ॒त क्रतु॑:। वृ॒त्र॒घ्ना व॑रिवो॒विदा॑ मंसी॒ष्ठा अ॑श्व॒सात॑मः ॥

शु॒ष्मिन्ऽत॑मः । हि । ते॒ । मदः॑ । द्यु॒म्निन्ऽत॑मः । उ॒त । क्रतुः॑ । वृ॒त्र॒ऽघ्ना । व॒रि॒वः॒ऽविदा॑ । मं॒सी॒ष्ठाः । अ॒श्व॒ऽसात॑मः ॥

Mantra without Swara
शुष्मिन्तमो हि ते मदो द्युम्निन्तम उत क्रतु:। वृत्रघ्ना वरिवोविदा मंसीष्ठा अश्वसातमः ॥

शुष्मिन्ऽतमः। हि। ते। मदः। द्युम्निन्ऽतमः। उत। क्रतुः। वृत्रऽघ्ना। वरिवःऽविदा। मंसीष्ठाः। अश्वऽसातमः ॥ १.१७५.५

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे सबके ईश्वर सभापति ! (हि) जिस कारण (ते) आपका (शुष्मिन्तमः) अतीव बलवाला (मदः) आनन्द (उत) और (द्युम्निन्तमः) अतीव यशयुक्त (क्रतुः) पराक्रमरूप कर्म है उससे (वृत्रघ्ना) मेघ को छिन्न-भिन्न करनेवाले सूर्य के समान प्रकाशमान (वरिवोविदा) जिससे कि सेवा को प्राप्त होता उस पराक्रम से (अश्वसातमः) अतीव अश्वादिकों का अच्छे विभाग करनेवाले आप दूसरे के विषय (=विनय) को (मंसीष्ठाः) मानो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान तेजस्वी, बिजुली के समान पराक्रमी, यशस्वी, अत्यन्त बली जन विद्या, विनय और धर्म का सेवन करते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।