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Rigveda Mandal 1 / Sukta 175 / Mantra 4

191 Sukta
6 Mantra
1/175/4
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
मु॒षा॒य सूर्यं॑ कवे च॒क्रमीशा॑न॒ ओज॑सा। वह॒ शुष्णा॑य व॒धं कुत्सं॒ वात॒स्याश्वै॑: ॥

मु॒षा॒य । सू॒र्य॒ । क॒वे॒ । च॒क्रम् । ईशा॑नः । ओज॑सा । वह॑ । शुष्णा॑य । व॒धम् । कुत्स॑म् । वात॑स्य । अश्वैः॑ ॥

Mantra without Swara
मुषाय सूर्यं कवे चक्रमीशान ओजसा। वह शुष्णाय वधं कुत्सं वातस्याश्वै: ॥

मुषाय। सूर्यम्। कवे। चक्रम्। ईशानः। ओजसा। वह। शुष्णाय। वधम्। कुत्सम्। वातस्य। अश्वैः ॥ १.१७५.४

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 4

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Meaning
हे (कवे) क्रम क्रम से दृष्टि देने समस्त विद्याओं के जाननेवाले सभापति ! (ईशानः) ऐश्वर्य्यवान् समर्थ ! आप (सूर्य्यम्) सूर्यमण्डल के समान (ओजसा) बल से युक्त (चक्रम्) भूगोल के राज्य को (मुषाय) हर के (शुष्णाय) औरों के हृदय को सुखानेवाले दुष्ट के लिये (वातस्य) पवन के (अश्वैः) वेगादि गुणों के समान अपने बलों से (कुत्सम्) वज्र को घुमाके (वधम्) वध को (वह) पहुँचाओ अर्थात् उक्त दुष्ट को मारो ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो चक्रवर्त्ती राज्य करने की इच्छा करें वे डाकू और दुष्टाचारी मनुष्यों को निवार के न्याय को प्रवृत्त करावें ॥ ४ ॥
Subject
अब राजधर्म विषय में सभापति के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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