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Rigveda Mandal 1 / Sukta 175 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/175/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं हि शूर॒: सनि॑ता चो॒दयो॒ मनु॑षो॒ रथ॑म्। स॒हावा॒न्दस्यु॑मव्र॒तमोष॒: पात्रं॒ न शो॒चिषा॑ ॥

त्वम् । हि । शूरः॑ । सनि॑ता । चो॒दयः॑ । मनु॑षः । रथ॑म् । स॒हऽवा॑न् । दस्यु॑म् । अ॒व्र॒तम् । ओषः॑ । पात्र॑म् । न । शो॒चिषा॑ ॥

Mantra without Swara
त्वं हि शूर: सनिता चोदयो मनुषो रथम्। सहावान्दस्युमव्रतमोष: पात्रं न शोचिषा ॥

त्वम्। हि। शूरः। सनिता। चोदयः। मनुषः। रथम्। सहऽवान्। दस्युम्। अव्रतम्। ओषः। पात्रम्। न। शोचिषा ॥ १.१७५.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे सेनापति ! (हि) जिस कारण (शूरः) शूरवीर निडर (सनिता) सेना को संविभाग करने अर्थात् पद्मादि व्यूह रचना से बाँटनेवाले (त्वम्) आप (मनुषः) मनुष्यों और (रथम्) युद्ध के लिये प्रवृत्त किये हुए रथ को (चोदयः) प्रेरणा दें अर्थात् युद्ध समय में आगे को बढ़ावें और (सहावान्) बलवान् आप (शोचिषा) दीपते हुए अग्नि की लपट से जैसे (पात्रम्) काष्ठ आदि के पात्र को (न) वैसे (अव्रतम्) दुश्शील दुराचारी (दस्युम्) हठ कर पराये धन को हरनेवाले दुष्टजन को (ओषः) जलाओ इससे मान्यभागी होओ ॥ ३ ॥
Essence
जो सेनापति युद्ध समय में रथ आदि यान और योद्धाओं को ढङ्ग से चलाने को जानते हैं, वे आग जैसे काष्ठ को वैसे डाकुओं को भस्म कर सकते हैं ॥ ३ ॥
Subject
अब राजविषय में सेनापति के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।