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Rigveda Mandal 1 / Sukta 175 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/175/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ न॑स्ते गन्तु मत्स॒रो वृषा॒ मदो॒ वरे॑ण्यः। स॒हावाँ॑ इन्द्र सान॒सिः पृ॑तना॒षाळम॑र्त्यः ॥

आ । नः॒ । ते॒ । ग॒न्तु॒ । म॒त्स॒रः । वृषा॑ । मदः॑ । वरे॑ण्यः । स॒हऽवा॑न् । इ॒न्द्र॒ । सा॒न॒सिः । पृ॒त॒ना॒षाट् । अम॑र्त्यः ॥

Mantra without Swara
आ नस्ते गन्तु मत्सरो वृषा मदो वरेण्यः। सहावाँ इन्द्र सानसिः पृतनाषाळमर्त्यः ॥

आ। नः। ते। गन्तु। मत्सरः। वृषा। मदः। वरेण्यः। सहऽवान्। इन्द्र। सानसिः। पृतनाषाट्। अमर्त्यः ॥ १.१७५.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सभापति ! (ते) आपका जो (मत्सरः) सुख करनेवाला (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य (वृषा) वीर्यकारी (सहावान्) जिसमें बहुत सहनशीलता विद्यमान (सानसिः) जो अच्छे प्रकार रोगों का विभाग करनेवाला (पृतनाषाट्) जिससे मनुष्यों की सेना को सहते हैं और (अमर्त्यः) जो मनुष्य स्वभाव से विलक्षण (मदः) ओषधियों का रस है वह (नः) हम लोगों को (आ, गन्तु) प्राप्त हो ॥ २ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि आप्त धर्मात्मा जनों का ओषधि रस हमको प्राप्त हो, ऐसी सदा चाहना करें ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।