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Rigveda Mandal 1 / Sukta 174 / Mantra 8

191 Sukta
10 Mantra
1/174/8
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सना॒ ता त॑ इन्द्र॒ नव्या॒ आगु॒: सहो॒ नभोऽवि॑रणाय पू॒र्वीः। भि॒नत्पुरो॒ न भिदो॒ अदे॑वीर्न॒नमो॒ वध॒रदे॑वस्य पी॒योः ॥

सना॑ । ता । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । नव्याः॑ । आ । अ॒गुः॒ । सहः॑ । नभः॑ । अवि॑ऽरणाय । पू॒र्वीः । भि॒नत् । पुरः॑ । न । भिदः॑ । अदे॑वीः । न॒नमः॑ । वधः॑ । अदे॑वस्य । पी॒योः ॥

Mantra without Swara
सना ता त इन्द्र नव्या आगु: सहो नभोऽविरणाय पूर्वीः। भिनत्पुरो न भिदो अदेवीर्ननमो वधरदेवस्य पीयोः ॥

सना। ता। ते। इन्द्र। नव्याः। आ। अगुः। सहः। नभः। अविऽरणाय। पूर्वीः। भिनत्। पुरः। न। भिदः। अदेवीः। ननमः। वधः। अदेवस्य। पीयोः ॥ १.१७४.८

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य के समान प्रतापवान् राजन् ! आप (अविरणाय) युद्ध की निवृत्ति के लिये (नभः) हिंसक शत्रुजनों को (सहः) सहते हो। आप जैसे (पूर्वीः) प्राचीन (पुरः) शत्रुओं की नगरियों को (भिनत्) छिन्न-भिन्न करते हुए (न) वैसे (भिदः) भिन्न अलग-अलग (अदेवीः) शत्रुवर्गों की दुष्ट नगरियों को (ननमः) नमाते ढहाते हो उससे (अदेवस्य, पीयोः) राक्षसपन संचारते हुए शत्रुगण का (वधः) नाश होता है, यह जो (ते) आपके (सना) प्रसिद्ध शूरपने के काम हैं (ता) उनको (नव्याः) नवीन प्रजाजन (आगुः) प्राप्त होवें ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजजन संग्रामादि भूमियों में ऐसे शूरता दिखलानेवाले कामों का आचरण करें, जिनको देखके ही जिन्होंने पिछली शूरता के काम नहीं देखे वे नवीन दुष्ट प्रजाजन भयभीत हों ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।