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Rigveda Mandal 1 / Sukta 174 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/174/7
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
रप॑त्क॒विरि॑न्द्रा॒र्कसा॑तौ॒ क्षां दा॒सायो॑प॒बर्ह॑णीं कः। कर॑त्ति॒स्रो म॒घवा॒ दानु॑चित्रा॒ नि दु॑र्यो॒णे कुय॑वाचं मृ॒धि श्रे॑त् ॥

रप॑त् । क॒विः । इ॒न्द्र॒ । अ॒र्कऽसा॑तौ । क्षाम् । दा॒साय॑ । उ॒प॒ऽबर्ह॑णीम् । क॒रिति॑ कः । कर॑त् । ति॒स्रः । म॒घऽवा॑ । दानु॑ऽचित्राः । नि । दु॒र्यो॒णे । कुय॑वाचम् । मृ॒धि । श्रे॒त् ॥

Mantra without Swara
रपत्कविरिन्द्रार्कसातौ क्षां दासायोपबर्हणीं कः। करत्तिस्रो मघवा दानुचित्रा नि दुर्योणे कुयवाचं मृधि श्रेत् ॥

रपत्। कविः। इन्द्र। अर्कऽसातौ। क्षाम्। दासाय। उपऽबर्हणीम्। करिति कः। करत्। तिस्रः। मघऽवा। दानुऽचित्राः। नि। दुर्योणे। कुयवाचम्। मृधि। श्रेत् ॥ १.१७४.७

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य के समान सभापति ! जो (कविः) सर्वशास्त्रों का जाननेवाला (अर्कसातौ) अन्नों के अच्छे प्रकार विभाग में (दासाय) शूद्र वर्ग के लिये (उपबर्हणीम्) अच्छी वृद्धि देनेवाली (क्षाम्) भूमि को (कः) नियत करता वह सत्य स्पष्ट (रपत्) कहे जो (मघवा) उत्तम धन का सम्बन्ध रखनेवाला (तिस्रः) उत्तम, मध्यम और निकृष्ट कि (दानुचित्राः) अद्भुत दान जिनमें होता उन क्रियाओं को (करत्) नियत करे वह (दुर्योणे) समरभूमि विषयक (मृधि) युद्ध में (कुयवाचम्) कुत्सित यवों की प्रशंसा करनेवाले सामान्य जन का (नि, श्रेत्) आश्रय लेवे ॥ ७ ॥
Essence
शास्त्र जाननेवाले सभापति शूद्र वर्ग के लिये शास्त्र की शिक्षा के साथ उत्तमान्नादि की वृद्धि करनेवाली भूमि को संपादन करावें और सत्यशील तथा दान की विचित्रता संपादन करने के लिये उत्तम, मध्यम, निकृष्ट दानव्यवहारों को सिद्ध करे और सब काल में संग्रामादि भूमियों में शत्रुओं का संहार कर अपने राज्य को बढ़ाता रहे ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।