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Rigveda Mandal 1 / Sukta 174 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/174/5
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वह॒ कुत्स॑मिन्द्र॒ यस्मि॑ञ्चा॒कन्त्स्यू॑म॒न्यू ऋ॒ज्रा वात॒स्याश्वा॑। प्र सूर॑श्च॒क्रं वृ॑हताद॒भीके॒ऽभि स्पृधो॑ यासिष॒द्वज्र॑बाहुः ॥

वह॑ । कुत्स॑म् । इ॒न्द्र॒ । यस्मि॑न् । चा॒कन् । स्यू॒म॒न्यू इति॑ । ऋ॒ज्रा । वात॑स्य । अस्वा॑ । प्र । सूरः॑ । च॒क्रम् । वृ॒ह॒ता॒त् । अ॒भीके॑ । अ॒भि । स्पृधः॑ । या॒सि॒ष॒त् । वज्र॑ऽबाहुः ॥

Mantra without Swara
वह कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चाकन्त्स्यूमन्यू ऋज्रा वातस्याश्वा। प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीकेऽभि स्पृधो यासिषद्वज्रबाहुः ॥

वह। कुत्सम्। इन्द्र। यस्मिन्। चाकन्। स्यूमन्यू इति। ऋज्रा। वातस्य। अश्वा। प्र। सूरः। चक्रम्। वृहतात्। अभीके। अभि। स्पृधः। यासिषत्। वज्रऽबाहुः ॥ १.१७४.५

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 16 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) सभापति ! आप (यस्मिन्) जिस संग्राम में (वातस्य) पवन की सी शीघ्र और सरल गति (स्यूमन्यू) चाहने और (ऋज्रा) सरल चाल चलनेवाले (अश्वा) घोड़ों को (चाकन्) चाहते हैं उसमें (कुत्सम्) वज्र को (वह) पहुँचाओ वज्र चलाओ अर्थात् वज्र से शत्रुओं का संहार करो (सूरः) सूर्य के समान प्रतापवान् (वज्रबाहुः) शस्त्र-अस्त्रों को भुजाओं में धारण किये हुए आप (चक्रम्) अपने राज्य को (प्र, बृहताम्) बढ़ाओ और (अभीके) संग्राम में (स्पृधः) ईर्ष्या करते हुए शत्रुओं के (अभि, यासिषत्) सन्मुख जाने की इच्छा करो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य प्रतापवान् है, वैसा प्रतापवान् राजा अस्त्र और शस्त्रों के प्रहारों से संग्राम में शत्रुओं को अच्छे प्रकार जीतकर अपने राज्य को बढ़ावे ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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