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Rigveda Mandal 1 / Sukta 174 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/174/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अजा॒ वृत॑ इन्द्र॒ शूर॑पत्नी॒र्द्यां च॒ येभि॑: पुरुहूत नू॒नम्। रक्षो॑ अ॒ग्निम॒शुषं॒ तूर्व॑याणं सिं॒हो न दमे॒ अपां॑सि॒ वस्तो॑: ॥

अज॑ । वृतः॑ । इ॒न्द्र॒ । शूर॑ऽपत्नीः । द्याम् । च॒ । येभिः॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । नू॒नम् । रक्षः॑ । अ॒ग्निम् । अ॒शुष॑म् । तूर्व॑याणम् । सिं॒हः । न । दमे॑ । अपां॑सि । वस्तोः॑ ॥

Mantra without Swara
अजा वृत इन्द्र शूरपत्नीर्द्यां च येभि: पुरुहूत नूनम्। रक्षो अग्निमशुषं तूर्वयाणं सिंहो न दमे अपांसि वस्तो: ॥

अज। वृतः। इन्द्र। शूरऽपत्नीः। द्याम्। च। येभिः। पुरुऽहूत। नूनम्। रक्षः। अग्निम्। अशुषम्। तूर्वयाणम्। सिंहः। न। दमे। अपांसि। वस्तोः ॥ १.१७४.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरुहूत) बहुतों ने सत्कार किये हुए (इन्द्र) शत्रुदल के नाशक (वृतः) राज्याधिकार में स्वीकार किये हुए राजन् ! आप (येभिः) जिनके साथ (शूरपत्नीः) शूरों की पत्नी और (द्याञ्च) प्रकाश को (नूनम्) निश्चित (अज) जानो उनके साथ (सिंहः) सिंह के (न) समान (दमे) घर में (अपांसि) कर्मों के (वस्तोः) रोकने को (तूर्वयाणम्) शीघ्र गमस करानेवाले यान जिससे सिद्ध होते उस (अशुषम्) शोषरहित जिसमें अर्थात् लोहा, तांबा, पीतल आदि धातु पिघिला करें गीले हुआ करें उस (अग्निम्) अग्नि को (रक्षो) अवश्य रक्खो ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सिंह अपने भिटे में बल से सबको रोकता ले जाता है, वैसे राजा निज बल से अपने घर में लाभप्राप्ति के लिये प्रयत्न करे। जिस अच्छे प्रकार प्रयोग किये अग्नि से यान शीघ्र जाते हैं, उस अग्नि से सिद्ध किये हुए यान पर स्थिर होकर स्त्री-पुरुष इधर-उधर से आवें-जावें ॥ ३ ॥
Subject
अब राजजन सपत्नीक परिभ्रमण करें और कलाकौशल की सिद्धि के लिये अग्निविद्या को जानें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।