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Rigveda Mandal 1 / Sukta 174 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/174/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दनो॒ विश॑ इन्द्र मृ॒ध्रवा॑चः स॒प्त यत्पुर॒: शर्म॒ शार॑दी॒र्दर्त्। ऋ॒णोर॒पो अ॑नव॒द्यार्णा॒ यूने॑ वृ॒त्रं पु॑रु॒कुत्सा॑य रन्धीः ॥

दनः॑ । विशः॑ । इ॒न्द्र॒ । मृ॒ध्रऽवा॑चः । स॒प्त । यत् । पुरः॑ । शर्म॑ । शार॑दीः । दर्त् । ऋ॒णोः । अ॒पः । अ॒न॒व॒द्य॒ । अर्णाः॑ । यूने॑ । वृ॒त्रम् । पु॒रु॒ऽकुत्सा॑य । र॒न्धीः॒ ॥

Mantra without Swara
दनो विश इन्द्र मृध्रवाचः सप्त यत्पुर: शर्म शारदीर्दर्त्। ऋणोरपो अनवद्यार्णा यूने वृत्रं पुरुकुत्साय रन्धीः ॥

दनः। विशः। इन्द्र। मृध्रऽवाचः। सप्त। यत्। पुरः। शर्म। शारदीः। दर्त्। ऋणोः। अपः। अनवद्य। अर्णाः। यूने। वृत्रम्। पुरुऽकुत्साय। रन्धीः ॥ १.१७४.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विद्युत् अग्नि के समान वर्त्तमान ! (यत्) जो आप (सप्त) सात (शारदीः) शरद् ऋतु सम्बन्धिनी (पुरः) शत्रुओं की नगरी और (शर्म) शत्रु घर को (दर्त्) विदारनेवाले होते हैं (मृध्रवाचः) अति बढ़ी हुई जिनकी वाणी उन (विशः) प्रजाओं को (दनः) शिक्षा देते राज्य के अनुकूल शासन देते हैं सो हे (अनवद्य) प्रशंसा को प्राप्त राजन् ! जैसे सूर्यमण्डल (पुरुकुत्साय) बहुत वज्ररूपी अपनी किरणें जिसमें वर्त्तमान उस (यूने) तरुण प्रबलतर वा सुख-दुख से मिलते न मिलते हुए संसार के लिये (वृत्रम्) मेघ को प्राप्त कराके (अर्णाः) नदी सम्बन्धी (अपः) जलों को वर्षाता वैसे आप (ऋणोः) प्राप्त होओ (रन्धीः) अच्छे प्रकार कार्य सिद्धि करनेवाले होओ ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि शत्रुओं के पुर नगर, शरद् आदि ऋतुओं में सुख देनेवाले स्थान आदि वस्तु नष्ट कर शत्रुजन निवारणे चाहियें और सूर्य मेघजल से जैसे जगत् की रक्षा करता है, वैसे राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिये ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को सूर्य के दृष्टान्त से कहते हैं ।