Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 174 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/174/10
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वम॒स्माक॑मिन्द्र वि॒श्वध॑ स्या अवृ॒कत॑मो न॒रां नृ॑पा॒ता। स नो॒ विश्वा॑सां स्पृ॒धां स॑हो॒दा वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥

त्वम् । अ॒स्माक॑म् । इ॒न्द्र॒ । वि॒श्वध॑ । स्याः॒ । अ॒वृ॒कऽत॑मः । न॒रान् । नृ॒ऽपा॒ता । सः । नः॒ । विश्वा॑साम् । स्पृ॒धाम् । स॒हः॒ऽदाः । वि॒द्याम॑ । इ॒षम् । वृ॒जन॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् ॥

Mantra without Swara
त्वमस्माकमिन्द्र विश्वध स्या अवृकतमो नरां नृपाता। स नो विश्वासां स्पृधां सहोदा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥

त्वम्। अस्माकम्। इन्द्र। विश्वध। स्याः। अवृकऽतमः। नरान्। नृऽपाता। सः। नः। विश्वासाम्। स्पृधाम्। सहःऽदाः। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरऽदानुम् ॥ १.१७४.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 17 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सुख देनेवाले ! (त्वम्) आप (अस्माकम्) हमारे बीच (विश्वध) सब प्रकार से (नराम्) मनुष्यों में (नृपाता) मनुष्यों की रक्षा करनेवाले अर्थात् प्रजाजनों की पालना करनेवाले और (अवृकतमः) जिनके सम्बन्ध में चोरजन नहीं ऐसे (स्याः) हूजिये तथा (सः) सो आप (नः) हमारे (विश्वासाम्) समस्त (स्पृधाम्) युद्ध की क्रियाओं के (सहोदाः) बल देनेवाले हूजिये जिससे हम लोग (जीरदानुम्) जीव के रूप को (वृजनम्) धर्मयुक्त मार्ग को और (इषम्) शास्त्रविज्ञान को (विद्याम) प्राप्त होवें ॥ १० ॥
Essence
जो यम-नियमों से युक्त नियत इन्द्रियोंवाले प्रजाजनों के रक्षक चौर्यादि कर्मों को छोड़े हुए अपने राज्य में निवास करते हैं, वे अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥इस मन्त्र में राजजनों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह एकसौ चौहत्तरवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।