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Rigveda Mandal 1 / Sukta 173 / Mantra 9

191 Sukta
13 Mantra
1/173/9
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
असा॑म॒ यथा॑ सुष॒खाय॑ एन स्वभि॒ष्टयो॑ न॒रां न शंसै॑:। अस॒द्यथा॑ न॒ इन्द्रो॑ वन्दने॒ष्ठास्तु॒रो न कर्म॒ नय॑मान उ॒क्था ॥

असा॑म । यथा॑ । सु॒ऽस॒खायः॑ । ए॒न॒ । सु॒ऽअ॒भि॒ष्टयः॑ । न॒राम् । न । शंसैः॑ । अस॑त् । यथा॑ । नः॒ । इन्द्रः॑ । व॒न्द॒ने॒ऽस्थाः । तु॒रः । न । कर्म॑ । नय॑मानः । उ॒क्था ॥

Mantra without Swara
असाम यथा सुषखाय एन स्वभिष्टयो नरां न शंसै:। असद्यथा न इन्द्रो वन्दनेष्ठास्तुरो न कर्म नयमान उक्था ॥

असाम। यथा। सुऽसखायः। एन। सुऽअभिष्टयः। नराम्। न। शंसैः। असत्। यथा। नः। इन्द्रः। वन्दनेऽस्थाः। तुरः। न। कर्म। नयमानः। उक्था ॥ १.१७३.९

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (एन) पुरुषार्थ से सुखों को प्राप्त होते हुए विद्वान् ! (यथा) जैसे (स्वभिष्टयः) सुन्दर अभिप्राय और (सुसखायः) उत्तम मित्र जिनके वे हम लोग (नराम्) अग्रगामी प्रशंसित पुरुषों की (शंसैः) प्रशंसाओं के (न) समान उत्तम गुणों से आपको प्राप्त (असाम) होवें वा (यथा) जैसे (वन्दनेष्ठाः) स्तुति में स्थिर होता हुआ (तुरः) शीघ्रकारी (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त मित्र (कर्म) धर्म युक्त कर्म के (न) समान (नः) हमारे (उक्था) प्रशंसा युक्त विज्ञानों को (नयमानः) प्राप्त करता वा कराता हुआ (असत्) हो वैसा आचरण हम लोग करें ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सब प्राणियों में मित्रभाव से वर्त्तमान हैं, वे सबको अभिवादन करने योग्य हों, जो सबको उत्तम बोध को प्राप्त कराते हैं, वे अतीव उत्तम विद्यावाले होते हैं ॥ ९ ॥
Subject
अब मित्रपरत्व से विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।