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Rigveda Mandal 1 / Sukta 173 / Mantra 8

191 Sukta
13 Mantra
1/173/8
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वा हि ते॒ शं सव॑ना समु॒द्र आपो॒ यत्त॑ आ॒सु मद॑न्ति दे॒वीः। विश्वा॑ ते॒ अनु॒ जोष्या॑ भू॒द्गौः सू॒रीँश्चि॒द्यदि॑ धि॒षा वेषि॒ जना॑न् ॥

ए॒व । हि । ते॒ । शम् । सव॑ना । स॒मु॒द्रे । आपः॑ । यत् । ते॒ । आ॒सु । मद॑न्ति । दे॒वीः । विश्वा॑ । ते॒ । अनु॑ । जोष्या॑ । भू॒त् । गौः । सू॒रीन् । चि॒त् । यदि॑ । धि॒षा । वेषि॑ । जना॑न् ॥

Mantra without Swara
एवा हि ते शं सवना समुद्र आपो यत्त आसु मदन्ति देवीः। विश्वा ते अनु जोष्या भूद्गौः सूरीँश्चिद्यदि धिषा वेषि जनान् ॥

एव। हि। ते। शम्। सवना। समुद्रे। आपः। यत्। ते। आसु। मदन्ति। देवीः। विश्वा। ते। अनु। जोष्या। भूत्। गौः। सूरीन्। चित्। यदि। धिषा। वेषि। जनान् ॥ १.१७३.८

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभापति ! (समुद्रे) अन्तरिक्ष में (आपः) जलों के समान (ते) आपके (हि) ही (सवना) ऐश्वर्य (शम्) सुख (एव) ही करते हैं वा (ते) आपकी (देवीः) दिव्य गुण सम्पन्न विदुषी (यत्) जब (आसु) इन जलों में (मदन्ति) हर्षित होती हैं और आप (यदि) जो (धिषा) उत्तम बुद्धि से (सूरीन्) विद्वान् (चित्) मात्र (जनान्) जनों को (वेषि) चाहते हो तब (ते) आपकी (विश्वा) समस्त (गौः) विद्या सुशिक्षायुक्त वाणी (अनु, जोष्या) अनुकूलता से सेवने योग्य (भूत्) होती है ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य आकाश में मेघ की उन्नति कर सबको सुखी करता है, वैसे सज्जन पुरुष का बढ़ता हुआ ऐश्वर्य सबको आनन्दित करता है, जैसे पुरुष विद्वान् हों, वैसे स्त्री भी हों ॥ ८ ॥
Subject
फिर विद्वानों के उपदेश से राजविषय को अगले मन्त्र में कहा है ।