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Rigveda Mandal 1 / Sukta 173 / Mantra 7

191 Sukta
13 Mantra
1/173/7
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒मत्सु॑ त्वा शूर स॒तामु॑रा॒णं प्र॑प॒थिन्त॑मं परितंस॒यध्यै॑। स॒जोष॑स॒ इन्द्रं॒ मदे॑ क्षो॒णीः सू॒रिं चि॒द्ये अ॑नु॒मद॑न्ति॒ वाजै॑: ॥

स॒मत्ऽसु॑ । त्वा॒ । शू॒र॒ । स॒ताम् । उ॒रा॒णम् । प्र॒प॒थिन्ऽत॑मम् । प॒रि॒ऽतं॒स॒यध्यै॑ । स॒जोष॑सः । इन्द्र॑म् । मदे॑ । क्षो॒णीः । सू॒रिम् । चि॒त् । ये । अ॒नु॒ऽमद॑न्ति । वाजैः॑ ॥

Mantra without Swara
समत्सु त्वा शूर सतामुराणं प्रपथिन्तमं परितंसयध्यै। सजोषस इन्द्रं मदे क्षोणीः सूरिं चिद्ये अनुमदन्ति वाजै: ॥

समत्ऽसु। त्वा। शूर। सताम्। उराणम्। प्रपथिन्ऽतमम्। परिऽतंसयध्यै। सजोषसः। इन्द्रम्। मदे। क्षोणीः। सूरिम्। चित्। ये। अनुऽमदन्ति। वाजैः ॥ १.१७३.७

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) दुष्टों की हिंसा करनेवाले सेनाधीश ! (ये) जो (सजोषसः) समान प्रीति सेवनेवाले (समत्सु) सङ्ग्रामों में (परितंसयध्यै) सब ओर से भूषित करने के लिये (सताम्) सत्पुरुषों में (उराणम्) अधिक बल करते हुए (प्रपथिन्तमम्) अतिशयता से उत्तम पथगामी (इन्द्रम्) सेनापति (त्वा) तुमको (मदे) हर्ष आनन्द के लिये (क्षोणीः) भूमियों को (सूरिम्) विद्वान् के (चित्) समान (वाजैः) वेगादि गुणयुक्त वीर वा अश्वादिकों के साथ (अनु, मदन्ति) अनुमोद आनन्द देते हैं उनको तूँ भी आनन्दित कर ॥ ७ ॥
Essence
वे ही निर्वैर हैं, जो अपने समान और प्राणियों को जानते हैं। उन्हीं का राज्य बढ़ता है, जो सत्पुरुषों का ही प्रतिदिन सङ्ग करते हैं ॥ ७ ॥
Subject
अब विद्वद्विषय में राज्यप्राप्ति का साधन विषय अगले मन्त्र में कहा है ।