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Rigveda Mandal 1 / Sukta 173 / Mantra 6

191 Sukta
13 Mantra
1/173/6
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र यदि॒त्था म॑हि॒ना नृभ्यो॒ अस्त्यरं॒ रोद॑सी क॒क्ष्ये॒३॒॑ नास्मै॑। सं वि॑व्य॒ इन्द्रो॑ वृ॒जनं॒ न भूमा॒ भर्ति॑ स्व॒धावाँ॑ ओप॒शमि॑व॒ द्याम् ॥

प्र । यत् । इ॒त्था । म॒हि॒ना । नृऽभ्यः॑ । अस्ति॑ । अर॑म् । रोद॑सी॒ इति॑ । क॒क्ष्ये॒ इति॑ । न । अ॒स्मै॒ । सम् । वि॒व्ये॒ । इन्द्रः॑ । वृ॒जन॑म् । न । भूम॑ । भर्ति॑ । स्व॒धाऽवा॑न् । ओ॒प॒शम्ऽइ॑व । द्याम् ॥

Mantra without Swara
प्र यदित्था महिना नृभ्यो अस्त्यरं रोदसी कक्ष्ये३ नास्मै। सं विव्य इन्द्रो वृजनं न भूमा भर्ति स्वधावाँ ओपशमिव द्याम् ॥

प्र। यत्। इत्था। महिना। नृऽभ्यः। अस्ति। अरम्। रोदसी इति। कक्ष्ये३ इति। न। अस्मै। सम्। विव्ये। इन्द्रः। वृजनम्। न। भूम। भर्ति। स्वधाऽवान्। ओपशम्ऽइव। द्याम् ॥ १.१७३.६

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (इन्द्रः) सूर्य (वृजनम्) बल के (न) समान (भूम) बहुत पदार्थों को (सम्, विव्ये) अच्छे प्रकार स्वीकार करता और (स्वधावान्) अन्नादि पदार्थवाला यह सूर्यमण्डल (ओपशमिव) अत्यन्त एक में मिले हुए पदार्थ के समान (द्याम्) प्रकाश को (प्र, भर्त्ति) धारण करता (अस्मै) इसके लिये (कक्ष्ये) अपनी-अपनी कक्षाओं में प्रसिद्ध हुए (रोदसी) द्युलोक और पृथिवीलोक (न) नहीं (अरम्) परिपूर्ण होते वह (इत्था) इस प्रकार (महिना) अपनी महिमा से (नृभ्यः) अग्रगामी मनुष्यों के लिये परिपूर्ण (अरमस्ति) समर्थ हैं ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे प्रकाशरहित पृथिवी आदि पदार्थ सबका आच्छादन करते हैं, वैसे सूर्य अपने प्रकाश से सबका आच्छादन करता है। जैसे भूमिज पदार्थों को पृथिवी धारण करती है, ऐसे ही सूर्य भूगोलों को धारण करता है ॥ ६ ॥
Subject
अब इस प्रकृत विद्वद्विषय में लोकलोकान्तर विज्ञान विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।