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Rigveda Mandal 1 / Sukta 173 / Mantra 3

191 Sukta
13 Mantra
1/173/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नक्ष॒द्धोता॒ परि॒ सद्म॑ मि॒ता यन्भर॒द्गर्भ॒मा श॒रद॑: पृथि॒व्याः। क्रन्द॒दश्वो॒ नय॑मानो रु॒वद्गौर॒न्तर्दू॒तो न रोद॑सी चर॒द्वाक् ॥

नक्ष॑त् । होता॑ । परि॑ । सद्म॑ । मि॒ता । यन् । भर॑त् । गर्भ॑म् । आ । श॒रदः॑ । पृ॒थि॒व्याः । क्रन्द॑त् । अश्वः॑ । नय॑मानः । रु॒वत् । गौः । अ॒न्तः । दू॒तः । न । रोद॑सी॒ इति॑ । च॒र॒त् । वाक् ॥

Mantra without Swara
नक्षद्धोता परि सद्म मिता यन्भरद्गर्भमा शरद: पृथिव्याः। क्रन्ददश्वो नयमानो रुवद्गौरन्तर्दूतो न रोदसी चरद्वाक् ॥

नक्षत्। होता। परि। सद्म। मिता। यन्। भरत्। गर्भम्। आ। शरदः। पृथिव्याः। क्रन्दत्। अश्वः। नयमानः। रुवत्। गौः। अन्तः। दूतः। न। रोदसी इति। चरत्। वाक् ॥ १.१७३.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (होता) ग्रहण करनेवाला (मिता) प्रमाणयुक्त (सद्म) घरों को (नक्षत्) प्राप्त होवे वा (शरदः) शरद ऋतु सम्बन्धी (पृथिव्याः) पृथिवी के (गर्भम्) गर्भ को (आ, भरत्) पूरा करता वा (नयमानः) पदार्थों को पहुँचाता हुआ (अश्वः) घोड़े के समान (क्रन्दत्) शब्द करता वा (गौः) वृषभ के समान (रुवत्) शब्द करता वा (दूतः) समाचार पहुँचानेवाले दूत के (न) समान वा (वाग्) वाणी के समान (रोदसी) आकाश और पृथिवी के (अन्तः) बीच (चरत्) विचरता वैसे आप लोग (परि, यन्) पर्यटन करें ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे घोड़ा और गौएँ परिमित मार्ग को जाती हैं, वैसे अग्नि नियत किये हुए देशस्थान को जाता है, जैसे धार्मिक जन अपने पदार्थ लेते हैं, वैसे ऋतु अपने चिह्नों को प्राप्त होते हैं, वा जैसे द्यावापृथिवी एक साथ वर्त्तमान हैं, वैसे विवाह किये हुए स्त्री-पुरुष वर्त्तें ॥ ३ ॥
Subject
फिर प्रकारान्तर से उपदेश विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।