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Rigveda Mandal 1 / Sukta 173 / Mantra 2

191 Sukta
13 Mantra
1/173/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अर्च॒द्वृषा॒ वृष॑भि॒: स्वेदु॑हव्यैर्मृ॒गो नाश्नो॒ अति॒ यज्जु॑गु॒र्यात्। प्र म॑न्द॒युर्म॒नां गू॑र्त॒ होता॒ भर॑ते॒ मर्यो॑ मिथु॒ना यज॑त्रः ॥

अर्च॒त् । वृषा॑ । वृष॑ऽभिः । स्वऽइदु॑हव्यैः । मृ॒गः । न । अश्नः॑ । अति॑ । यत् । जु॒गु॒र्यात् । प्र । म॒न्द॒युः । म॒नाम् । गू॒र्त॒ । होता॑ । भर॑ते । मर्यः॑ । मि॒थु॒ना । यज॑त्रः ॥

Mantra without Swara
अर्चद्वृषा वृषभि: स्वेदुहव्यैर्मृगो नाश्नो अति यज्जुगुर्यात्। प्र मन्दयुर्मनां गूर्त होता भरते मर्यो मिथुना यजत्रः ॥

अर्चत्। वृषा। वृषऽभिः। स्वऽइदुहव्यैः। मृगः। न। अश्नः। अति। यत्। जुगुर्यात्। प्र। मन्दयुः। मनाम्। गूर्त। होता। भरते। मर्यः। मिथुना। यजत्रः ॥ १.१७३.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (वृषा) सत्योपदेशरूपी शब्दों की वर्षा करनेवाला (अश्नः) शुभ गुणों में व्याप्त (मन्दयुः) अपनी प्रशंसा चाहता हुआ (होता) दानशील (यजत्रः) सङ्ग करनेवाला (मर्यः) मरणधर्म्मा मनुष्य (स्वेदुहव्यैः) आप ही प्रकाशित किये देने-लेने के व्यवहारों और (वृषभिः) उपदेश करनेवालों के साथ (यत्) जो (मृगः) हरिण के (न) समान (अति, जुगुर्यात्) अतीव उद्यम करे, अति यत्न करे और (भरते) धारण करता (मनाम्) विचारशीलों का सङ्ग (अर्चत्) सराहे प्रशंसित करे वा जैसे (मिथुना) स्त्री-पुरुष दो-दो मिलके सङ्ग धर्म को करें वैसे तुम (प्र, गूर्त्त) उत्तम उद्यम करो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे स्वयंवर किये हुए स्त्री-पुरुष परस्पर उद्योग कर हरिण के समान वेग से घर के कामों को सिद्ध कर विद्वानों के सङ्ग से सत्य का स्वीकार कर असत्य को छोड़कर परमेश्वर और विद्वानों का सत्कार करते हैं, वैसे समस्त मनुष्य सङ्ग करनेवाले हों ॥ २ ॥
Subject
अब चलते हुए प्रकरण में स्त्री-पुरुष के घर के काम के दृष्टान्त से औरों को उपदेश करते हैं ।

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