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Rigveda Mandal 1 / Sukta 173 / Mantra 10

191 Sukta
13 Mantra
1/173/10
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
विष्प॑र्धसो न॒रां न शंसै॑र॒स्माका॑स॒दिन्द्रो॒ वज्र॑हस्तः। मि॒त्रा॒युवो॒ न पूर्प॑तिं॒ सुशि॑ष्टौ मध्या॒युव॒ उप॑ शिक्षन्ति य॒ज्ञैः ॥

विऽस्प॑र्धसः । न॒राम् । न । शंसैः॑ । अ॒स्माक॑ । अ॒स॒त् । इन्द्रः॑ । वज्र॑ऽहस्तः । मि॒त्र॒ऽयुवः॑ । न । पूःऽप॑तिम् । सुऽशि॑श्टौ । म॒ध्य॒ऽयुवः॑ । उप॑ । शि॒क्ष॒न्ति॒ । य॒ज्ञैः ॥

Mantra without Swara
विष्पर्धसो नरां न शंसैरस्माकासदिन्द्रो वज्रहस्तः। मित्रायुवो न पूर्पतिं सुशिष्टौ मध्यायुव उप शिक्षन्ति यज्ञैः ॥

विऽस्पर्धसः। नराम्। न। शंसैः। अस्माक। असत्। इन्द्रः। वज्रऽहस्तः। मित्रऽयुवः। न। पूःऽपतिम्। सुऽशिष्टौ। मध्यऽयुवः। उप। शिक्षन्ति। यज्ञैः ॥ १.१७३.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(वज्रहस्तः) शस्त्र और अस्त्रों की शिक्षा जिसके हाथ में है वह (इन्द्रः) सभापति (अस्माक) हमारा (असत्) हो अर्थात् हमारा रक्षक हो ऐसी (नराम्) धर्म की प्राप्ति करानेवाले पुरुषों की (शंसैः) प्रशंसायुक्त विवादों के (न) समान वादानुवादों से (विष्पर्द्धसः) परस्पर विशेषता से स्पर्द्धा ईर्ष्या करते और (मित्रायुवः) अपने को मित्र चाहते हुए जनों के (न) समान (मध्यायुवः) मध्यस्थ चाहते हुए विद्वान् जन (सुशिष्टौ) उत्तम शिक्षा के निमित्त (यज्ञैः) पढ़ना-पढ़ाना, उपदेश करना और सङ्ग मेल-मिलाप करना इत्यादि कर्मों से (पूर्पतिम्) पुरी नगरियों के पालनेवाले सभापति राजा को (उप, शिक्षन्ति) उपशिक्षा देते हैं अर्थात् उसके समीप जाकर उसे अच्छे-बुरे का भेद सिखाते हैं ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे सत्याचरण में स्पर्द्धा करनेवाले सबके मित्र पक्षपातरहित सत्य का आचरण करते हुए जन सत्य का उपदेश करते हैं, वैसे ही सभापति राजा प्रजाजनों में वर्त्ते ॥ १० ॥
Subject
अब राजशिक्षा पर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।