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Rigveda Mandal 1 / Sukta 172 / Mantra 2

191 Sukta
3 Mantra
1/172/2
Devata- मरुतः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ॒रे सा व॑: सुदानवो॒ मरु॑त ऋञ्ज॒ती शरु॑:। आ॒रे अश्मा॒ यमस्य॑थ ॥

आ॒रे । सा । वः॒ । सु॒ऽदा॒न॒वः॒ । मरु॑तः । ऋ॒ञ्ज॒ती । शरुः॑ । आ॒रे । अश्मा॑ । यम् । अस्य॑थ ॥

Mantra without Swara
आरे सा व: सुदानवो मरुत ऋञ्जती शरु:। आरे अश्मा यमस्यथ ॥

आरे। सा। वः। सुऽदानवः। मरुतः। ऋञ्जती। शरुः। आरे। अश्मा। यम्। अस्यथ ॥ १.१७२.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 12 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुदानवः) प्रशंसित दान करनेवाले (मरुतः) वायुवत् बलवान् विद्वानो ! (वः) तुम्हारी जो (ऋञ्जती) पचाती-जलाती (शरुः) दुष्टों को विनाशती हुई द्विधारा तलवार है (सा) वह हमसे (आरे) दूर रहे और (यम्) जिस विशेष शस्त्र को (अश्मा) मेघ के समान तुम (अस्यथ) छोड़ते हो वह हमारे (आरे) समीप रहे ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य मेघ के समान सुख देनेवाले, दुष्टों को छोड़नेवाले, श्रेष्ठों के समीप और दुष्टों से दूर वसते हैं, वे सङ्ग करने योग्य हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।