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Rigveda Mandal 1 / Sukta 171 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/171/5
Devata- मरुतः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
येन॒ माना॑सश्चि॒तय॑न्त उ॒स्रा व्यु॑ष्टिषु॒ शव॑सा॒ शश्व॑तीनाम्। स नो॑ म॒रुद्भि॑र्वृषभ॒ श्रवो॑ धा उ॒ग्र उ॒ग्रेभि॒: स्थवि॑रः सहो॒दाः ॥

येन॑ । माना॑सः । चि॒तय॑न्ते । उ॒स्राः । विऽउ॑ष्टिषु । शव॑सा । शश्व॑तीनाम् । सः । नः॒ । म॒रुत्ऽभिः॑ । वृ॒ष॒भ॒ । श्रवः॑ । धाः॒ । उ॒ग्रः । उ॒ग्रेभिः॑ । स्थवि॑रः । स॒हः॒ऽदाः ॥

Mantra without Swara
येन मानासश्चितयन्त उस्रा व्युष्टिषु शवसा शश्वतीनाम्। स नो मरुद्भिर्वृषभ श्रवो धा उग्र उग्रेभि: स्थविरः सहोदाः ॥

येन। मानासः। चितयन्ते। उस्राः। विऽउष्टिषु। शवसा। शश्वतीनाम्। सः। नः। मरुत्ऽभिः। वृषभ। श्रवः। धाः। उग्रः। उग्रेभिः। स्थविरः। सहःऽदाः ॥ १.१७१.५

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 11 Mantra » 5

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Meaning
(येन) जिस (शवसा) बल से वर्त्तमान (शश्वतीनाम्) सनातन (व्युष्टिषु) नाना प्रकार की वस्तियों में (उस्राः) मूल राज्य में परम्परा से निवास करते हुए (मानासः) विचारवान् विद्वान् जन प्रजाजनों को (चितयन्ते) चैतन्य करते हैं। हे (वृषभ) सुखों की वर्षा करनेवाले सभापति ! (उग्रेभिः) तेजस्वी (मरुद्भिः) विद्वानों के साथ (उग्रः) तीव्रस्वभाव (स्थविरः) कृतज्ञ वृद्ध (सहोदाः) बल के देनेवाले होते हुए आप (श्रवः) अन्न आदि पदार्थ को (धाः) धारण कीजिये और (सः) सो आप (नः) हमारे राजा हूजिये ॥ ५ ॥
Essence
जहाँ सभा में मूल जड़ के अर्थात् निष्कलङ्क कुल परम्परा से उत्पन्न हुए और शास्त्रवेत्ता धार्मिक सभासद् सत्य न्याय करें और विद्या तथा अवस्था से वृद्ध सभापति भी हो वहाँ अन्याय का प्रवेश नहीं होता है ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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