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Rigveda Mandal 1 / Sukta 170 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/170/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
किं नो॑ भ्रातरगस्त्य॒ सखा॒ सन्नति॑ मन्यसे। वि॒द्मा हि ते॒ यथा॒ मनो॒ऽस्मभ्य॒मिन्न दि॑त्ससि ॥

किम् । न॒ । भ्रा॒तः॒ । अ॒ग॒स्त्य॒ । सखा॑ । सन् । अति॑ । म॒न्य॒से॒ । वि॒द्म । हि । ते॒ । यथा॑ । मनः॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । इत् । न । दि॒त्स॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
किं नो भ्रातरगस्त्य सखा सन्नति मन्यसे। विद्मा हि ते यथा मनोऽस्मभ्यमिन्न दित्ससि ॥

किम्। न। भ्रातः। अगस्त्य। सखा। सन्। अति। मन्यसे। विद्म। हि। ते। यथा। मनः। अस्मभ्यम्। इत्। न। दित्ससि ॥ १.१७०.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अगस्त्य) विज्ञान में उत्तमता रखनेवाले (भ्रातः) भाई विद्वान् (सखा) मित्र (सन्) होते हुए आप (नः) हम लोगों को (किम्) क्या (अति, मन्यसे) अतिमान करते हो ? अर्थात् हमारे मान को छोड़कर वर्त्तते हो ? (यथा) जैसे (ते) तुम्हारा अपना (मनः) अन्तःकरण (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (हि) ही (न)(दित्ससि) देना चाहते हो अर्थात् हमारे लिये अपने अन्तःकरण को उत्साहित क्या नहीं किया चाहते हो ? वैसे (इत्) ही तुमको हम लोग (विद्म) जानें ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो जिनके मित्र हों वे मन, वचन और कर्म से उनकी प्रसन्नता का काम करें और जितना विद्या, ज्ञान अपने को हो उतना मित्र के समर्पण करे ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।