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Rigveda Mandal 1 / Sukta 170 / Mantra 2

191 Sukta
5 Mantra
1/170/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
किं न॑ इन्द्र जिघांससि॒ भ्रात॑रो म॒रुत॒स्तव॑। तेभि॑: कल्पस्व साधु॒या मा न॑: स॒मर॑णे वधीः ॥

किम् । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । जि॒घां॒स॒सि॒ । भ्रात॑रः । म॒रुतः॑ । तव॑ । तेभिः॑ । क॒ल्प॒स्व॒ । सा॒धु॒ऽया । मा । नः॒ । स॒म्ऽअर॑णे । व॒धीः॒ ॥

Mantra without Swara
किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव। तेभि: कल्पस्व साधुया मा न: समरणे वधीः ॥

किम्। नः। इन्द्र। जिघांससि। भ्रातरः। मरुतः। तव। तेभिः। कल्पस्व। साधुऽया। मा। नः। सम्ऽअरणे। वधीः ॥ १.१७०.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सभापति विद्वान् ! जो हम (मरुतः) मनुष्य लोग (तव) आपके (भ्रातरः) भाई हैं उन (नः) हम लोगों को (किम्) क्या (जिंघाससि) मारने की इच्छा करते हो ? (तेभिः) उन हम लोगों के साथ (साधुया) उत्तम काम से (कल्पस्व) समर्थ होओ और (समरणे) संग्राम में (नः) हम लोगों को (मा, वधीः) मत मारिये ॥ २ ॥
Essence
जो कोई बन्धुओं को पीड़ा देना चाहें वे सदा पीड़ित होते हैं और जो बन्धुओं की रक्षा किया चाहते हैं वे समर्थ होते हैं अर्थात् सब काम उनके प्रबलता से बनते हैं, जो सबका उपकार करनेवाले हैं, उनको कुछ भी काम अप्रिय नहीं प्राप्त होता ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।