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Rigveda Mandal 1 / Sukta 17 / Mantra 8

191 Sukta
9 Mantra
1/17/8
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑वरुण॒ नू नु वां॒ सिषा॑सन्तीषु धी॒ष्वा। अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ यच्छतम्॥

इन्द्रा॑वरुणा । नु । नु । वा॒म् । सिसा॑सन्तीषु । धी॒षु । आ । अ॒स्मभ्य॑म् । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
इन्द्रावरुण नू नु वां सिषासन्तीषु धीष्वा। अस्मभ्यं शर्म यच्छतम्॥

इन्द्रावरुणा। नु। नु। वाम्। सिसासन्तीषु। धीषु। आ। अस्मभ्यम्। शर्म। यच्छतम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 33 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(नु) जिस कारण से (इन्द्रावरुणा) इन्द्र और वरुण (सिषासन्तीषु) उत्तम कर्म करने को चाहने और (धीषु) शुभ अशुभ वृत्तान्त धारण करनेवाली बुद्धियों में (नु) शीघ्र (अस्मभ्यम्) हम पुरुषार्थी विद्वानों के लिये (शर्म) दुःखविनाश करनेवाले उत्तम सुख का (आयच्छतम्) अच्छी प्रकार विस्तार करते हैं, इससे (वाम्) उन को कार्य्यों की सिद्धि के लिये मैं निरन्तर (हुवे) ग्रहण करता हूँ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से हुवे इस पद का ग्रहण किया है। जो मनुष्य शास्त्र से उत्तमता को प्राप्त हुई बुद्धियों से शिल्प आदि उत्तम व्यवहारों में उक्त इन्द्र और वरुण को अच्छी रीति से युक्त करते हैं, वे ही इस संसार में सुखों को फैलाते हैं॥८॥
Subject
फिर उन से क्या-क्या सिद्ध होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-