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Rigveda Mandal 1 / Sukta 17 / Mantra 6

191 Sukta
9 Mantra
1/17/6
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तयो॒रिदव॑सा व॒यं स॒नेम॒ नि च॑ धीमहि। स्यादु॒त प्र॒रेच॑नम्॥

तयोः॑ । इत् । अव॑सा । व॒यम् । स॒नेम॑ । नि । च॒ । धी॒म॒हि॒ । स्यात् । उ॒त । प्र॒ऽरेच॑नम् ॥

Mantra without Swara
तयोरिदवसा वयं सनेम नि च धीमहि। स्यादुत प्ररेचनम्॥

तयोः। इत्। अवसा। वयम्। सनेम। नि। च। धीमहि। स्यात्। उत। प्रऽरेचनम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 33 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हम लोग जिन इन्द्र और वरुण के (अवसा) गुणज्ञान वा उनके उपकार करने से (इत्) ही जिन सुख और उत्तम धनों को (सनेम) सेवन करें (तयोः) उनके निमित्त से (च) और उनसे पाये हुए असंख्यात धन को (निधीमहि) स्थापित करें अर्थात् कोश आदि उत्तम स्थानों में भरें, और जिन धनों से हमारा (प्रचेरनम्) अच्छी प्रकार अत्यन्त खरच (उत) भी (स्यात्) सिद्ध हो॥६॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि अग्नि आदि पदार्थों के उपयोग से भरपूर धन को सम्पादन और उसकी रक्षा वा उन्नति करके यथायोग्य खर्च करने से विद्या और राज्य की वृद्धि से सबके हित की उन्नति करनी चाहिये॥६॥
Subject
फिर उन दोनों से मनुष्यों को क्या-क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-