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Rigveda Mandal 1 / Sukta 17 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/17/5
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- भुरिगार्चीगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्रः॑ सहस्र॒दाव्नां॒ वरु॑णः॒ शंस्या॑नाम्। क्रतु॑र्भवत्यु॒क्थ्यः॑॥

इन्द्रः॑ । स॒ह॒स्र॒ऽदाव्ना॑म् । वरु॑णः । शंस्या॑नाम् । क्रतुः॑ । भ॒व॒ति॒ । उ॒क्थ्यः॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रः सहस्रदाव्नां वरुणः शंस्यानाम्। क्रतुर्भवत्युक्थ्यः॥

इन्द्रः। सहस्रऽदाव्नाम्। वरुणः। शंस्यानाम्। क्रतुः। भवति। उक्थ्यः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 32 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
सब मनुष्यों को योग्य है कि जो (इन्द्र) अग्नि बिजुली और सूर्य्य (हि) जिस कारण (सहस्रदाव्नाम्) असंख्यात धन के देनेवालों के मध्य में (क्रतुः) उत्तमता से कार्य्यों को सिद्ध करनेवाले (भवति) होते हैं, तथा जो (वरुणः) जल, पवन और चन्द्रमा भी (शंस्यानाम्) प्रशंसनीय पदार्थों में उत्तमता से कार्य्यों के साधक हैं, इससे जानना चाहिये कि उक्त बिजुली आदि पदार्थ (उक्थ्यः) साधुता के साथ विद्या की सिद्धि करने में उत्तम हैं॥५॥
Essence
पहिले मन्त्र से इस मन्त्र में हि इस पद की अनुवृत्ति है। जितने पृथिवी आदि वा अन्न आदि पदार्थ दान आदि के साधक हैं, उनमें अग्नि विद्युत् और सूर्य्य मुख्य हैं, इससे सबको चाहिये कि उनके गुणों का उपदेश करके उनकी स्तुति वा उनका उपदेश सुनें और करें, क्योंकि जो पृथिवी आदि पदार्थों में जल वायु और चन्द्रमा अपने-अपने गुणों के साथ प्रशंसा करने और जानने योग्य हैं, वे क्रियाकुशलता में संयुक्त किये हुए उन क्रियाओं की सिद्धि करानेवाले होते हैं॥५॥
Subject
फिर इन्द्र और वरुण किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-