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Rigveda Mandal 1 / Sukta 17 / Mantra 3

191 Sukta
9 Mantra
1/17/3
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒नु॒का॒मं त॑र्पयेथा॒मिन्द्रा॑वरुण रा॒य आ। ता वां॒ नेदि॑ष्ठमीमहे॥

अ॒नु॒ऽका॒मम् । त॒र्प॒ये॒था॒म् । इन्द्रा॑वरुणा । रा॒यः । आ । ता । वा॒म् । नेदि॑ष्ठम् । ई॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
अनुकामं तर्पयेथामिन्द्रावरुण राय आ। ता वां नेदिष्ठमीमहे॥

अनुऽकामम्। तर्पयेथाम्। इन्द्रावरुणा। रायः। आ। ता। वाम्। नेदिष्ठम्। ईमहे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 32 Mantra » 3

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Meaning
जो (इन्द्रावरुण) अग्नि और जल (अनुकामम्) हर एक कार्य्य में (रायः) धनों को देकर (तर्प्पयेथाम्) तृप्ति करते हैं, (ता) उन (वाम्) दोनों को हम लोग (नेदिष्ठम्) अच्छी प्रकार अपने निकट जैसे हो, वैसे (ईमहे) प्राप्त करते हैं॥३॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि जिस प्रकार अग्नि और जल के गुणों को जानकर क्रियाकुशलता में संयुक्त किये हुए ये दोनों बहुत उत्तम-उत्तम सुखों को प्राप्त करें, उस युक्ति के साथ कार्य्यों में अच्छी प्रकार इनका प्रयोग करना चाहिये॥३॥
Subject
इस प्रकार साधे हुए ये दोनों किस किसके हेतु होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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