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Rigveda Mandal 1 / Sukta 17 / Mantra 2

191 Sukta
9 Mantra
1/17/2
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- यवमध्याविराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गन्ता॑रा॒ हि स्थोऽव॑से॒ हवं॒ विप्र॑स्य॒ माव॑तः। ध॒र्तारा॑ चर्षणी॒नाम्॥

गन्ता॑राः । हि । स्थः । अव॑से । हव॑म् । विप्र॑स्य । माव॑तः । ध॒र्तारा॑ च॒र्ष॒णी॒नाम् ॥

Mantra without Swara
गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः। धर्तारा चर्षणीनाम्॥

गन्ताराः। हि। स्थः। अवसे। हवम्। विप्रस्य। मावतः। धर्तारा चर्षणीनाम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 32 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (हि) निश्चय करके ये सम्प्रयोग किये हुए अग्नि और जल (मावतः) मेरे समान पण्डित तथा (विप्रस्य) बुद्धिमान् विद्वान् के (हवम्) पदार्थों का लेना-देना करानेवाले होम वा शिल्प व्यवहार को (गन्तारा) प्राप्त होते तथा (चर्षणीनाम्) पदार्थों के उठानेवाले मनुष्य आदि जीवों के (धर्त्तारा) धारण करनेवाले (स्थः) होते हैं, इससे मैं इनको अपने सब कामों की (अवसे) क्रिया की सिद्धि के लिये (आवृणे) स्वीकार करता हूँ॥२॥
Essence
पूर्वमन्त्र से इस मन्त्र में आवृणे इस पद का ग्रहण किया है। विद्वानों से युक्ति के साथ कलायन्त्रों में युक्त किये हुए अग्नि-जल जब कलाओं से बल में आते हैं, तब रथों को शीघ्र चलाने, उनमें बैठे हुए मनुष्य आदि प्राणी पदार्थों के धारण कराने और सबको सुख देनेवाले होते हैं॥२॥
Subject
अब इन्द्र और वरुण से संयुक्त किये हुए अग्नि और जल के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-