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Rigveda Mandal 1 / Sukta 169 / Mantra 3

191 Sukta
8 Mantra
1/169/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अम्य॒क्सा त॑ इन्द्र ऋ॒ष्टिर॒स्मे सने॒म्यभ्वं॑ म॒रुतो॑ जुनन्ति। अ॒ग्निश्चि॒द्धि ष्मा॑त॒से शु॑शु॒क्वानापो॒ न द्वी॒पं दध॑ति॒ प्रयां॑सि ॥

अम्य॑क् । सा । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । ऋ॒ष्टिः । अ॒स्मे इति॑ । सने॑मि । अभ्व॑म् । म॒रुतः॑ । जु॒न॒न्ति॒ । अ॒ग्निः । चि॒त् । हि । स्म॒ । अ॒त॒से । शु॒शु॒क्वान् आपः॑ । न । द्वी॒पम् । दध॑ति । प्रयां॑सि ॥

Mantra without Swara
अम्यक्सा त इन्द्र ऋष्टिरस्मे सनेम्यभ्वं मरुतो जुनन्ति। अग्निश्चिद्धि ष्मातसे शुशुक्वानापो न द्वीपं दधति प्रयांसि ॥

अम्यक्। सा। ते। इन्द्र। ऋष्टिः। अस्मे इति। सनेमि। अभ्वम्। मरुतः। जुनन्ति। अग्निः। चित्। हि। स्म। अतसे। शुशुक्वान् आपः। न। द्वीपम्। दधति। प्रयांसि ॥ १.१६९.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) दुष्टों को विदारण करनेवाले ! जिससे (मरुतः) मनुष्य (सनेमि) प्राचीन और (अभ्वम्) नेत्र से प्रत्यक्ष देखने में अप्रसिद्ध उत्तम विषय को (जुनन्ति) प्राप्त होते हैं (सा) वह (ते) आपकी (ऋष्टिः) प्राप्ति (अस्मे) हमारे लिये (अम्यक्) सीधी चाल को प्राप्त होती है अर्थात् सरलता से आप हम लोगों को प्राप्त होते हैं। और (शुशुक्वान्) शुद्ध करनेवाले (अग्निः) अग्नि के समान (चित्) ही आप (हि) निश्चय के साथ (स्म) जैसे आश्चर्यवत् (आपः) जल (द्वीपम्) दो प्रकार से जिसमें जल आवें-जावें उस बड़े भारी नद को प्राप्त हों (न) वैसे सबके अनादि कारण को (अतसे) निरन्तर प्राप्त होते हैं इससे सब मनुष्य (प्रयांसि) सुन्दर मनोहर चाहने योग्य वस्तुओं को (दधति) धारण करते हैं ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस अनादि कारण को विद्वान् जानते उसको और जन नहीं जान सकते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।