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Rigveda Mandal 1 / Sukta 168 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/168/7
Devata- मरुतः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सा॒तिर्न वोऽम॑वती॒ स्व॑र्वती त्वे॒षा विपा॑का मरुत॒: पिपि॑ष्वती। भ॒द्रा वो॑ रा॒तिः पृ॑ण॒तो न दक्षि॑णा पृथु॒ज्रयी॑ असु॒र्ये॑व॒ जञ्ज॑ती ॥

सा॒तिः । न । वः॒ । अम॑ऽवती । स्वः॑ऽवती । त्वे॒षा । विऽपा॑का । म॒रु॒तः॒ । पिपि॑ष्वती । भ॒द्रा । वः॒ । रा॒तिः । पृ॒ण॒तः । न । दक्षि॑णा । पृ॒थु॒ऽज्रयी॑ । असु॒र्या॑ऽइव । जञ्ज॑ती ॥

Mantra without Swara
सातिर्न वोऽमवती स्वर्वती त्वेषा विपाका मरुत: पिपिष्वती। भद्रा वो रातिः पृणतो न दक्षिणा पृथुज्रयी असुर्येव जञ्जती ॥

सातिः। न। वः। अमऽवती। स्वःऽवती। त्वेषा। विऽपाका। मरुतः। पिपिष्वती। भद्रा। वः। रातिः। पृणतः। न। दक्षिणा। पृथुऽज्रयी। असुर्याऽइव। जञ्जती ॥ १.१६८.७

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 7 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) विद्वानो ! (वः) तुम्हारी जो (पिपिष्वती) बहुत अङ्गोंवाली (अमवती) ज्ञानवती (स्वर्वती) जिसमें सुख विद्यमान (विपाका) विविध प्रकार के गुणों से परिपक्व (त्वेषा) उत्तम दीप्ति (सातिः) लोकों की विभक्ति अर्थात् विशेष भाग के (न) समान है और (वः) तुम्हारी जो (पृणतः) पालन करने वा विद्यादि गुणों से परिपूर्ण करनेवाले की (दक्षिणा) देने योग्य दक्षिणा के (न) समान (पृथुज्रयी) बहुत वेगवती (असुर्येव) प्राणों में होनेवाली बिजुली के समान वा (जञ्जती) युद्ध में प्रवृत्त झंझियाती हुई सेना के समान (भद्रा) कल्याण करनेवाली (रातिः) देनी है, उससे सबको बढ़ाओ ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो इन जीवों की पाप पुण्य से उत्पन्न हुई सुख दुःख फलवाली गति है, उससे समस्त जीव विचरते हैं। जो पुरुषार्थी जन सेना जन शत्रुओं को जैसे-वैसे पापों को जीत निवारि धर्म का आचरण करते हैं, वे सदैव सुखी होते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।