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Rigveda Mandal 1 / Sukta 168 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/168/4
Devata- मरुतः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अव॒ स्वयु॑क्ता दि॒व आ वृथा॑ ययु॒रम॑र्त्या॒: कश॑या चोदत॒ त्मना॑। अ॒रे॒णव॑स्तुविजा॒ता अ॑चुच्यवुर्दृ॒ळ्हानि॑ चिन्म॒रुतो॒ भ्राज॑दृष्टयः ॥

अव॑ । स्वऽयु॑क्ताः । दि॒वः । आ । वृथा॑ । य॒युः॒ । अम॑र्त्याः । कश॑या । चो॒द॒त॒ । त्मना॑ । अ॒रे॒णवः॑ । तु॒वि॒ऽजा॒ताः । अ॒चु॒च्य॒वुः॒ । दृ॒ळ्हानि॑ । चि॒त् । म॒रुतः॑ । भ्राज॑द्ऽऋष्टयः ॥

Mantra without Swara
अव स्वयुक्ता दिव आ वृथा ययुरमर्त्या: कशया चोदत त्मना। अरेणवस्तुविजाता अचुच्यवुर्दृळ्हानि चिन्मरुतो भ्राजदृष्टयः ॥

अव। स्वऽयुक्ताः। दिवः। आ। वृथा। ययुः। अमर्त्याः। कशया। चोदत। त्मना। अरेणवः। तुविऽजाताः। अचुच्यवुः। दृळ्हानि। चित्। मरुतः। भ्राजद्ऽऋष्टयः ॥ १.१६८.४

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (त्मना) आत्मा से (कशया) शिक्षा या गति से जैसे (स्वयुक्ताः) अपने से गमन करनेवाले (अमर्त्याः) मरणधर्मरहित (अरेणवः) जिनमें रेणु वालू नहीं विद्यमान (तुविजाताः) बल के साथ प्रसिद्ध और (भ्राजदृष्टयः) जिनकी प्रकाशमान गति वे (मरुतः) पवन (दिवः) आकाश से (आ, ययुः) आते प्राप्त होते हैं और (दृढ़ानि) पुष्ट (चित्) भी पदार्थों को (वृथा) वृथा निष्काम (अव, अचुच्यवुः) प्राप्त होते वैसे इनको (चोदत) प्रेरणा देओ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पवन आप ही जाते-आते हैं और अग्नि आदि पदार्थों को धारण कर दृढ़ता से प्रकाशित करते हैं, वैसे विद्वान् जन आप ही पढ़ाने और उपदेशों में नियुक्त हो व्यर्थ कामों को छोड़कर और छुड़वा के विद्या और उत्तम शिक्षा से सब जनों को प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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