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Rigveda Mandal 1 / Sukta 168 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/168/3
Devata- मरुतः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सोमा॑सो॒ न ये सु॒तास्तृ॒प्तांश॑वो हृ॒त्सु पी॒तासो॑ दु॒वसो॒ नास॑ते। ऐषा॒मंसे॑षु र॒म्भिणी॑व रारभे॒ हस्ते॑षु खा॒दिश्च॑ कृ॒तिश्च॒ सं द॑धे ॥

सोमा॑सः । न । ये । सु॒ताः । तृ॒प्तऽअं॑शवः । हृ॒त्ऽसु । पी॒तासः॑ । दु॒वसः॑ । न । आस॑ते । आ । ए॒षा॒म् । अंसे॑षु । र॒म्भिणी॑ऽइव । र॒र॒भे॒ । हस्ते॑षु । खा॒दिः । च॒ । कृ॒तिः । च॒ । सम् । द॒धे॒ ॥

Mantra without Swara
सोमासो न ये सुतास्तृप्तांशवो हृत्सु पीतासो दुवसो नासते। ऐषामंसेषु रम्भिणीव रारभे हस्तेषु खादिश्च कृतिश्च सं दधे ॥

सोमासः। न। ये। सुताः। तृप्तऽअंशवः। हृत्ऽसु। पीतासः। दुवसः। न। आसते। आ। एषाम्। अंसेषु। रम्भिणीऽइव। ररभे। हस्तेषु। खादिः। च। कृतिः। च। सम्। दधे ॥ १.१६८.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
मैं (ये) जो पवनों के समान विद्वान् (तृप्तांशवः) जिनसे सूर्य किरण आदि पदार्थ तृप्त होते और वे (सुताः) कूट-पीट निकाले हुए (सोमासः) सोमादि ओषधि रस (हृत्सु) हृदयों में (पीतासः) पीये हुए हों उनके (न) समान वा (दुवसः) सेवन करनेवालों के (न) समान (आसते) बैठते स्थिर होते (एषाम्) इनके (अंसेषु) भुजस्कन्धों में (रम्भिणीव) जैसे प्रत्येक काम का आरम्भ करनेवाली स्त्री संलग्न हो वैसे (आ, रारभे) संलग्न होता हूँ। और जिन्होंने (हस्तेषु) हाथों में (खादिः) भोजन (च) और (कृतिः) क्रिया (च) भी धारण की है उनके साथ सब क्रियाओं को (सम्, दधे) अच्छे प्रकार धारण करता हूँ ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सज्जन ओषधियों के समान दुष्ट शिक्षा और दुष्टाचार के विनाश करने, सेवकों के समान सुख देने और पतिव्रता स्त्री के समान प्रिय आचरण करनेवाले क्रियाकुशल हैं, वे इस सृष्टि में सब विद्याओं के अच्छे धारण करने यथायोग्य कामों में वर्त्ताने को योग्य होते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।