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Rigveda Mandal 1 / Sukta 168 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/168/10
Devata- मरुतः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒ष व॒: स्तोमो॑ मरुत इ॒यं गीर्मा॑न्दा॒र्यस्य॑ मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। एषा या॑सीष्ट त॒न्वे॑ व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥

ए॒षः । वः॒ । स्तोमः॑ । म॒रु॒तः॒ । इ॒यम् । गीः । मा॒न्दा॒र्यस्य॑ । मा॒न्यस्य॑ । का॒रोः । आ । इ॒षा । या॒सी॒ष्ट॒ । त॒न्वे॑ । व॒याम् । वि॒द्याम॑ । इ॒षम् । वृ॒जन॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् ॥

Mantra without Swara
एष व: स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः। एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥

एषः। वः। स्तोमः। मरुतः। इयम्। गीः। मान्दार्यस्य। मान्यस्य। कारोः। आ। इषा। यासीष्ट। तन्वे। वयाम्। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरऽदानुम् ॥ १.१६८.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) श्रेष्ठ विद्वानो ! जो (एषः) यह (वः) तुम्हारा (स्तोमः) प्रश्नोत्तररूप आलाप कथन (मान्दार्यस्य) सबके लिये आनन्द देनेवाले उत्तम (मान्यस्य) जानने योग्य (कारोः) क्रियाकुशल सज्जन की जो (इयम्) यह (गीः) सत्यप्रिया वाणी और जो (इषा) इच्छा के साथ (तन्वे) शरीर सुख के लिये (आ, यासीष्ट) प्राप्त हो उससे (दयाम्) हम लोग (इषम्) अन्न (वृजनम्) शत्रुओं को दुःख देनेवाले बल और (जीरदानुम्) जीवों की दया को (विद्याम) प्राप्त होवें ॥ १० ॥
Essence
जो समस्त विद्या की स्तुति और प्रशंसा करने और आप्तवाक् अर्थात् धर्मात्मा विद्वानों की वाणियों में रहने तथा जीवों की दया से युक्त सज्जन पुरुष हैं, वे सभों के सुखों को उत्पन्न करानेवाले होते हैं ॥ १० ॥इस सूक्त में पवनों के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ अरसठवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।