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Rigveda Mandal 1 / Sukta 167 / Mantra 9

191 Sukta
11 Mantra
1/167/9
Devata- इन्द्रो मरुच्च Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न॒ही नु वो॑ मरुतो॒ अन्त्य॒स्मे आ॒रात्ता॑च्चि॒च्छव॑सो॒ अन्त॑मा॒पुः। ते धृ॒ष्णुना॒ शव॑सा शूशु॒वांसोऽर्णो॒ न द्वेषो॑ धृष॒ता परि॑ ष्ठुः ॥

न॒हि । नु । वः॒ । म॒रु॒तः॒ । अन्ति॑ । अ॒स्मे इति॑ । आ॒रात्ता॑त् । चि॒त् । शव॑सः । अन्त॑म् । आ॒पुः । ते । धृ॒ष्णुना॑ शव॑सा । शू॒शु॒ऽवांसः॑ । अर्णः॑ । न । द्वेषः॑ । धृ॒ष॒ता । परि॑ । स्थुः॒ ॥

Mantra without Swara
नही नु वो मरुतो अन्त्यस्मे आरात्ताच्चिच्छवसो अन्तमापुः। ते धृष्णुना शवसा शूशुवांसोऽर्णो न द्वेषो धृषता परि ष्ठुः ॥

नहि। नु। वः। मरुतः। अन्ति। अस्मे इति। आरात्तात्। चित्। शवसः। अन्तम्। आपुः। ते। धृष्णुना शवसा। शूशुऽवांसः। अर्णः। न। द्वेषः। धृषता। परि। स्थुः ॥ १.१६७.९

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) महाबलवान् विद्वानो ! जो (वः) तुम्हारे और (अस्मे) हमारे (अन्ति) समीप में (शवसः) बल की (अन्तम्) सीमा को (नु) शीघ्र (नहि) नहीं (आपुः) प्राप्त होते और जो (आरात्तात्) दूर से (चित्) भी (धृष्णुना) दृढ़ (शवसा) बल से (शूशुवांसः) बढ़ते हुए (अर्णः) जल के (न) समान (धृषता) प्रगल्भता से ढिठाई से (द्वेषः) वैर आदि दोष वा धर्मविरोधी मनुष्यों को (परि, स्थुः) सब ओर से छोड़ने में स्थिर हों (ते) वे आप्त अर्थात् शास्त्रज्ञ धर्मात्मा हों ॥ ९ ॥
Essence
यदि हम लोग पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होवें तो शत्रुजन हमारा और तुम्हारा पराजय न कर सकें। जो दुष्ट और लोभादि दोषों को छोड़ें, वे अति बली होकर दुःख के पार पहुँचें ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।