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Rigveda Mandal 1 / Sukta 167 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/167/4
Devata- इन्द्रो मरुच्च Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
परा॑ शु॒भ्रा अ॒यासो॑ य॒व्या सा॑धार॒ण्येव॑ म॒रुतो॑ मिमिक्षुः। न रो॑द॒सी अप॑ नुदन्त घो॒रा जु॒षन्त॒ वृधं॑ स॒ख्याय॑ दे॒वाः ॥

परा॑ । शु॒भ्राः । अ॒यासः॑ । य॒व्या । सा॒धा॒र॒ण्याऽइ॑व । म॒रुतो॑ । मि॒मि॒क्षुः॒ । न । रो॒द॒सी इति॑ । अप॑ । नु॒द॒न्त॒ । घो॒राः । जु॒षन्त॑ । वृध॑म् । स॒ख्याय॑ । दे॒वाः ॥

Mantra without Swara
परा शुभ्रा अयासो यव्या साधारण्येव मरुतो मिमिक्षुः। न रोदसी अप नुदन्त घोरा जुषन्त वृधं सख्याय देवाः ॥

परा। शुभ्राः। अयासः। यव्या। साधारण्याऽइव। मरुतो। मिमिक्षुः। न। रोदसी इति। अप। नुदन्त। घोराः। जुषन्त। वृधम्। सख्याय। देवाः ॥ १.१६७.४

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे (शुभ्राः) स्वच्छ (अयासः) शीघ्रगामी (मरुतः) पवन (यव्या) मिली न मिली हुई चाल से (रोदसी) आकाश और पृथिवी को (मिमिक्षुः) सींचते और (घोराः) बिजुली के योग से भयङ्कर होते हुए (न, परा, अप, नुदन्त) उनको परावृत्त नहीं करते, उलट नहीं देते वैसे (देवाः) विद्वान् जन (वृधम्) वृद्धि को (सख्याय) मित्रता के लिये (साधारण्येव) साधारण क्रिया से जैसे वैसे (जुषन्त) सेवें ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वायु और बिजुली के योग से उत्पन्न हुई वर्षा अनेक ओषधियों को उत्पन्न कर सब प्राणियों को जीवन देकर दुःखों को दूर करती है वा जैसे उत्तम पतिव्रता स्त्री पति को आनन्दित करती है, वैसे ही विद्वान् जन विद्या और उत्तम शिक्षा की वर्षा से और धर्म के सेवन से सब मनुष्यों को आह्लादित करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।