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Rigveda Mandal 1 / Sukta 167 / Mantra 11

191 Sukta
11 Mantra
1/167/11
Devata- इन्द्रो मरुच्च Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒ष व॒: स्तोमो॑ मरुत इ॒यं गीर्मा॑न्दा॒र्यस्य॑ मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। एषा या॑सीष्ट त॒न्वे॑ व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम् ॥

ए॒षः । वः॒ । स्तोमः॑ । म॒रु॒तः॒ । इ॒यम् । गीः । मा॒न्दा॒र्यस्य॑ । मा॒न्यस्य॑ । का॒रोः । आ । इषा । या॒सी॒ष्ट॒ । त॒न्वे॑ । व॒याम् । वि॒द्याम॑ । इ॒षम् । वृ॒जन॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् ॥

Mantra without Swara
एष व: स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः। एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥

एषः। वः। स्तोमः। मरुतः। इयम्। गीः। मान्दार्यस्य। मान्यस्य। कारोः। आ। इषा। यासीष्ट। तन्वे। वयाम्। विद्याम। इषम्। वृजनम्। जीरऽदानुम् ॥ १.१६७.११

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) विद्वानो ! (एषः) यह (वः) तुम्हारी (स्तोमः) स्तुति और (मान्दार्यस्य) आनन्द के देनेवाले उत्तम (मान्यस्य) मान सत्कार करने योग्य (कारोः) सबका सुख करनेवाले सज्जन की (इयम्) यह (गीः) वेदविद्या की उत्तम शिक्षा से युक्त वाणी है इसकी जो (इषा) इच्छा के साथ (आ, यासीष्ट) प्राप्ति हो (वयाम्) हम लोग (तन्वे) शरीर के लिये उस (इषम्) इच्छा (जीरदानुम्) जीवन के निमित्त और (वृजनम्) बल को (विद्याम) जानें ॥ ११ ॥
Essence
जो सबसे प्रशंसा करने योग्य गुणों को प्राप्त होकर आप्त धर्मात्मा सज्जनों का सत्कार कर शरीर और आत्मा के बल के लिये विद्या और पराक्रम सम्पादन करते हैं, वे सुख से जीते हैं ॥ ११ ॥इस सूक्त में वायु के दृष्टान्त से सज्जन विद्वान् जनों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह समझना चाहिये ॥यह एकसौ सरसठवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।