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Rigveda Mandal 1 / Sukta 166 / Mantra 8

191 Sukta
15 Mantra
1/166/8
Devata- मरुतः Rishi- मैत्रावरुणोऽगस्त्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
श॒तभु॑जिभि॒स्तम॒भिह्रु॑तेर॒घात्पू॒र्भी र॑क्षता मरुतो॒ यमाव॑त। जनं॒ यमु॑ग्रास्तवसो विरप्शिनः पा॒थना॒ शंसा॒त्तन॑यस्य पु॒ष्टिषु॑ ॥

श॒तभु॑जिऽभिः । तम् । अ॒भिऽह्रु॑तेः । अ॒घात् । पूः॒ऽभिः । र॒क्ष॒त॒ । म॒रु॒तः॒ । यम् । आव॑त । जन॑म् । यम् । उ॒ग्राः॒ । त॒व॒सः॒ । वि॒ऽर॒प्शि॒नः॒ । पा॒थन॑ । शंसा॑त् । तन॑यस्य । पु॒ष्टिषु॑ ॥

Mantra without Swara
शतभुजिभिस्तमभिह्रुतेरघात्पूर्भी रक्षता मरुतो यमावत। जनं यमुग्रास्तवसो विरप्शिनः पाथना शंसात्तनयस्य पुष्टिषु ॥

शतभुजिऽभिः। तम्। अभिऽह्रुतेः। अघात्। पूःऽभिः। रक्षत। मरुतः। यम्। आवत। जनम्। यम्। उग्राः। तवसः। विऽरप्शिनः। पाथन। शंसात्। तनयस्य। पुष्टिषु ॥ १.१६६.८

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (तनयस्य) सन्तान की (पुष्टिषु) पुष्टि करनेवाले कामों में प्रयत्न करते हुए (उग्राः) तेजस्वी तीव्र प्रतापयुक्त (तवसः) अत्यन्त बढ़े हुए बल से युक्त (विरप्शिनः) पूर्ण विद्या पूर्ण शिक्षा और पूर्ण पराक्रमवाले (मरुतः) पवनों के समान वर्त्तमान विद्वानो ! तुम (शतभुजिभिः) असङ्ख्य सुख भोगने को जिनका शील (पूर्भिः) पूरण, पालन और सुखयुक्त नगरों के साथ (यम्) जिसकी (अभिह्रुतेः) सब ओर से कुटिल (अघात्) पाप से (रक्षत) रक्षा करो बचाओ वा (यम्) जिस (जनम्) जन को (आवत) पालो वा जिसकी (शंसात्) आत्मप्रशंसारूप दोष से (पाथन) पालना करो (तम्) उसकी हम लोग भी सब ओर से रक्षा करें ॥ ८ ॥
Essence
जो मनुष्य युक्त आहार-विहार, उत्तम शिक्षा, ब्रह्मचर्य और विद्यादि गुणों से अपने सन्तानों को पुष्टियुक्त, सत्य की प्रशंसा करनेवाले और पाप से अलग रहनेवाले करते और प्राण के समान प्रजा को आनन्दित करते हैं, वे अनन्त सुखभोक्ता होते हैं ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।