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Rigveda Mandal 1 / Sukta 166 / Mantra 7

191 Sukta
15 Mantra
1/166/7
Devata- मरुतः Rishi- मैत्रावरुणोऽगस्त्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र स्क॒म्भदे॑ष्णा अनव॒भ्ररा॑धसोऽलातृ॒णासो॑ वि॒दथे॑षु॒ सुष्टु॑ताः। अर्च॑न्त्य॒र्कं म॑दि॒रस्य॑ पी॒तये॑ वि॒दुर्वी॒रस्य॑ प्रथ॒मानि॒ पौंस्या॑ ॥

प्र । स्क॒म्भऽदे॑ष्णाः । अ॒न॒व॒भ्रऽरा॑धसः । अ॒ला॒तृ॒णासः॑ । वि॒दथे॑षु । सुऽस्तु॑ताः । अर्च॑न्ति । अ॒र्कम् । म॒दि॒रस्य॑ । पी॒तये॑ । वि॒दुः । वी॒रस्य॑ । प्र॒थ॒मानि॑ । पौंस्या॑ ॥

Mantra without Swara
प्र स्कम्भदेष्णा अनवभ्रराधसोऽलातृणासो विदथेषु सुष्टुताः। अर्चन्त्यर्कं मदिरस्य पीतये विदुर्वीरस्य प्रथमानि पौंस्या ॥

प्र। स्कम्भऽदेष्णाः। अनवभ्रऽराधसः। अलातृणासः। विदथेषु। सुऽस्तुताः। अर्चन्ति। अर्कम्। मदिरस्य। पीतये। विदुः। वीरस्य। प्रथमानि। पौंस्या ॥ १.१६६.७

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 2

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Meaning
जो (स्कम्भदेष्णाः) स्तम्भन देनेवाले अर्थात् रोक देनेवाले (अनवभ्रराधसः) जिनका धन विनाश को नहीं प्राप्त हुआ, (अलातृणासः) पूर्ण शत्रुओं को मारनेहारे (सुष्टुताः) अच्छी प्रशंसा को प्राप्त जन (विदथेषु) संग्रामों में (वीरस्य) शूरता आदि गुणयुक्त युद्ध करनेवाले के (प्रथमानि) प्रथम (पौंस्या) पुरुषार्थों बलों को (विदुः) जानते हैं वे (मदिरस्य) आनन्ददायक रस के (पीतये) पीने को (अर्कम्) सत्कार करने योग्य विद्वान् का (प्र, अर्च्चन्ति) अच्छा सत्कार करते हैं ॥ ७ ॥
Essence
जो यथायोग्य आहार-विहार करने, शूरजनों से प्रीति रखनेवाले अपनी सेना के बलों को बढ़ाते हैं, वे शत्रुरहित असङ्ख्य धनयुक्त बहुत दान देनेवाले और प्रशंसा को प्राप्त होते हैं ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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