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Rigveda Mandal 1 / Sukta 166 / Mantra 6

191 Sukta
15 Mantra
1/166/6
Devata- मरुतः Rishi- मैत्रावरुणोऽगस्त्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यू॒यं न॑ उग्रा मरुतः सुचे॒तुनारि॑ष्टग्रामाः सुम॒तिं पि॑पर्तन। यत्रा॑ वो दि॒द्युद्रद॑ति॒ क्रिवि॑र्दती रि॒णाति॑ प॒श्वः सुधि॑तेव ब॒र्हणा॑ ॥

यू॒यम् । नः॒ । उ॒ग्राः॒ । म॒रु॒तः॒ । सु॒ऽचे॒तुना॑ । अरि॑ष्टऽग्रामाः । सु॒ऽम॒तिम् । पि॒प॒र्त॒न॒ । यत्र॑ । वः॒ । दि॒द्युत् । रद॑ति । क्रिविः॑ऽदती । रि॒णाति॑ । प॒श्वः । सुधि॑ताऽइव । ब॒र्हणा॑ ॥

Mantra without Swara
यूयं न उग्रा मरुतः सुचेतुनारिष्टग्रामाः सुमतिं पिपर्तन। यत्रा वो दिद्युद्रदति क्रिविर्दती रिणाति पश्वः सुधितेव बर्हणा ॥

यूयम्। नः। उग्राः। मरुतः। सुऽचेतुना। अरिष्टऽग्रामाः। सुऽमतिम्। पिपर्तन। यत्र। वः। दिद्युत्। रदति। क्रिविःऽदती। रिणाति। पश्वः। सुधिताऽइव। बर्हणा ॥ १.१६६.६

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (उग्राः) तीव्रगुणकर्मस्वभावयुक्त (मरुतः) पवनों के समान शीघ्रता करनेवाले विद्वानो ! (यूयम्) तुम (अरिष्टग्रामाः) जिनसे ग्राम के ग्राम अहिंसक होते अर्थात् पशु आदि जीवों को जिन्होंने ताड़ना देना छोड़ दिया ऐसे होते हुए (नः) हमारी (सुमतिम्) प्रशस्त उत्तम बुद्धि को (सुचेतुना) सुन्दर विज्ञान से (पिपर्त्तन) पूरी करो। (यत्र) जहाँ (क्रिविर्दती) हिंसा करने रूप दाँत हैं जिसके वह (वः) तुम्हारे सम्बन्ध से (दिद्युत्) अत्यन्त प्रकाशमान बिजुली (रदति) पदार्थों को छिन्न-भिन्न करती है वहाँ (सुधितेव) अच्छे प्रकार धारण की हुई वस्तु के समान (बर्हणा) बढ़ती हुई (पश्वः) पशुओं को अर्थात् पशुभावों को (रिणाति) प्राप्त होती जैसे पशु, घोड़े, बैल आदि रथादिकों को जोड़े हुए उनको चलाते हैं वैसे उन रथों को अति वेग से चलाती है ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। शिल्पव्यवहार से सिद्ध की बिजुलीरूप आग घोड़े आदि पशुओं के समान कार्य सिद्ध करनेवाली होती है, उसकी क्रिया को जाननेवाले विद्वान् अन्य जनों को भी उस विद्युद्विद्या से कुशल करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।