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Rigveda Mandal 1 / Sukta 166 / Mantra 5

191 Sukta
15 Mantra
1/166/5
Devata- मरुतः Rishi- मैत्रावरुणोऽगस्त्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यत्त्वे॒षया॑मा न॒दय॑न्त॒ पर्व॑तान्दि॒वो वा॑ पृ॒ष्ठं नर्या॒ अचु॑च्यवुः। विश्वो॑ वो॒ अज्म॑न्भयते॒ वन॒स्पती॑ रथी॒यन्ती॑व॒ प्र जि॑हीत॒ ओष॑धिः ॥

यत् । त्वे॒षऽया॑माः । न॒दय॑न्त । पर्व॑तान् । दि॒वः । वा॒ । पृ॒ष्ठम् । नर्याः॑ । अचु॑च्यवुः । विश्वः॑ । वः॒ । अज्म॑न् । भ॒य॒ते॒ । वन॒स्पतिः॑ । र॒थि॒यन्ती॑ऽइव । प्र । जि॒ही॒ते॒ । ओष॑धिः ॥

Mantra without Swara
यत्त्वेषयामा नदयन्त पर्वतान्दिवो वा पृष्ठं नर्या अचुच्यवुः। विश्वो वो अज्मन्भयते वनस्पती रथीयन्तीव प्र जिहीत ओषधिः ॥

यत्। त्वेषऽयामाः। नदयन्त। पर्वतान्। दिवः। वा। पृष्ठम्। नर्याः। अचुच्यवुः। विश्वः। वः। अज्मन्। भयते। वनस्पतिः। रथियन्तीऽइव। प्र। जिहीते। ओषधिः ॥ १.१६६.५

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (यत्) जब (त्वेषयामाः) अग्नि का प्रकाश होने से गमन करनेवाले (नर्याः) मनुष्यों के लिये अत्यन्त साधक तुम्हारे रथ (दिवः) अन्तरिक्ष के (पर्वतान्) मेघों को (नदयन्त) शब्दायमान करते अर्थात् तुम्हारे रथों के वेग से अपने स्थान से तितर-वितर हुए मेघ गर्जनादि शब्द करते हैं (वा) अथवा पृथिवी के (पृष्ठम्) पृष्ठ भाग को (अचुच्यवुः) प्राप्त होते तब (विश्वः, वनस्पतिः) समस्त वृक्ष (रथियन्तीव) अपने रथी को चाहती हुई सेना के समान (वः) तुम्हारे (अज्मन्) मार्ग में (भयते) कँपता है अर्थात् जो वृक्ष मार्ग में होता वह थरथरा उठता और (ओषधिः) सोमादि ओषधि (प्र, जिहीते) अच्छे प्रकार स्थान त्याग कर देती अर्थात् कपकपाहट में स्थान से तितर-वितर होती है ॥ ५ ॥
Essence
अन्तरिक्ष के मार्गों में विद्वानों के प्रयोग किये हुए आकाशगामी यानों के अत्यन्त वेग से कभी मेघों के तितर-वितर जाने का सम्भव और पृथिवी के कम्पन से वृक्ष वनस्पति के कम्पने का सम्भव होता है ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।